Wednesday, November 11, 2009

आओ देखें इक स्वप्न नया........







आओ देखें इक स्वप्न नया,
नई रचना हों, नई उम्मीदें,
 छोटी-छोटी सी ख्वाहिशें हो, 
हो अपनों की खुशियां जिनमें।





 पल-पल के सपने तैर रहे, 
छोटी-छोटी आशाओं में, 
मन मचल रहा छूने को यूं, 
हो सीप में,... कोई मोती जैसे।






ठण्डी में सौंधी-सी धूप खिले, 
हर तरफ हों नन्हें फूल खिलें, 
तितली में, हों कई रंग भरे, 
ख्वाबों में भी लगे पंख नये।
...........



प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र साभार गूगल)
 



Thursday, October 29, 2009

मेरे बिस्तर के सिरहाने.............







न पूछो क्यों, हम नींद में, 
हंसते हैं, और कभी रोते हैं, 
ख्वाब में अक्सर........,  
दर्द की यादों में, तो कभी,  
खुशियों की महफलों में होते हैं।



यूं ही मिलते हैं हम,  
जमाने से मुलाकातों में, 
वर्ना तो मिलने में ही,  
जमाने होते हैं, 
खूबसूरत सी मुलाकात हुई हो कोई, 
बस वही ख्वाब.........,  
बिस्तर के सिरहाने होते हैं।
..........



 प्रीती बङथ्वाल तारिका  
(चित्र साभार गूगल)


Monday, September 28, 2009

कुछ कहते हुए.....ख़्वाब





कुछ कहते हुए....ख़्वाब, 
कुछ सुनते हुए....ख़्वाब, 
चलो इन ख़्वाबों को, 
आज अपना बनालूं,



कहदूं इन्हें दिल के,
 वो सारे जज़्बात, 
और आंखों में अपनी, 
मैं इनको सजा लूं,



 जब खोल के देखूं, 
मूंदी हुई पलकें, 
और सामने बैठे हो, 
कुछ कीमती सपनें,


कह दूं उन्हें भी, 
हैं ये भी कुछ अपने, 
लो संग इन्हें भी, 
दर्पण में समा लो,



 कुछ कहते हुए......ख़्वाब, 
कुछ सुनते हुए......ख़्वाब,
 चलो इन ख्वाबों को, 
आज अपना बना लूं।

...........

प्रीती बङथ्वाल तारिका 
(चित्र- साभार गूगल)


Monday, September 21, 2009

मां पार लगा दे नैया....




शुभ नवरात्रि

मां तेरे रंग में रंग जांएगे,
मां तेरे ही हम गुण गाएंगे,
हम बच्चें तेरे हैं, तू है मैया,
मां पार लगा दे नैया, मां पार लगा दे नैया।




तू दर आये की सुनती,
तू हर खुशियों को बुनती,
मेरी  इक आस है मैया,
मेरे घर भी आये मैया,
मां पार लगा दे नैया, मां पार लगा दे नैया।





इस जगत में भटक रहें हैं,
किस बात को तरस रहें हैं,
ये समझ में आये कहीं ना,
तू अब राह दिखादे मैया,
मां पार लगा दे नैया, मां पार लगा दे नैया।




भक्तों की आस तुम्हीं हो,
भक्तों की आवाज़ तुम्हीं हो,
भगती को ऐसे, ठुकराओ नहीं मां,
हमें गले लगा ले मैया,
मां पार लगा दे नैया, मां पार लगा दे नैया।

         .................


प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र साभार गूगल)

Tuesday, September 8, 2009

“शिवा”


हमारे घर में एक नये मेहमान का आगमन हुआ। वो अभी सिर्फ एक महीना नौ दिन का ही है। बहुत ही प्यारा है। जब से घर में आया है तब से ही सबका चहेता बना हुआ है। सभी उसके साथ खेलते है, उसकी हर हरकत पर खुश होते हैं। वैसे वो अधिकतर मेरे पास ही रहता है, मेरी आवाज को पहचानता है। अब अपना नाम भी पहचानने लगा है। उसका नाम शिवा है।


पहली बार जब उसे देखा था तो वो केवल तेरह दिन का था। बहुत ही छोटा, आंखे भी नहीं खुली थी शिवा की, और चलना, तो दूर की बात। उसे जब अपने हाथों में लिया तो उस पर प्यार छलक उठा, बस यही वाला पसन्द है ये सोच कर मैने इनकी ओर देखा। ये मुझे देखते ही समझ गये कि मुझे ये पसन्द आ गया है। उसने उसी दिन मेरे हाथों में पहली बार आंखे खोली थी। मेरा मन उस पर आ चुका था मैने उसे लेने का फैसला कर लिया।


उसे हम अपने साथ नहीं ला सकते थे क्योंकि वो अभी बहुत छोटा था। उसे छोङ कर आने का मन नहीं कर रहा था, लेकिन जैसे-तैसे मन को समझा कर हम घर लौट आये। लेकिन घर आने के बाद भी मेरी जुबान पर उसकी ही बातें चल रही थी। वो कितना प्यारा था, उसने मेरी हाथों पर ही पहली बार अपनी आंखे खोली थी। हम उसका नाम क्या रखेगें। मैं तो जैसे उस नन्हें के बारे में सोच-सोच कर ही दिन काट देती थी। ये सारी बातें मेरे पतिदेव को बार-बार सुनने को मिल रही थी।


मेरी उत्सुकता को देखते हुए पतिदेव ने जल्द ही उसे लाने का फैसला कर लिया। जब वो बीस दिन का हो गया तो हम उसे लेने के लिए गये उसकी हलचलों में थोङा फर्क था वो गिर-गिर के चलने लगा था। अभी शुरुवात थी चलने की और मां के दूध के साथ बोतल से भी दूध पीने लगा था। इसका मतलब था कि अब हम उसे अपने साथ ला सकते थे और हम उसे अपने साथ ले आए। उसका नाम मैंने शिवा रखा। घर में सभी को (पतिदेव और बेटे को) ये नाम पसन्द आया।

जिस दिन हमने शिवा को लाने का फैसला किया, सुबह बेटा स्कूल जा चुका था। बेटे को सरप्राइज गिफ्ट के रूप में हम शिवा देना चाहते थे। अभी तक शिवा का नाम तो बेटा जानता था, पर ये शिवा है क्या, इस बारे में उसे कुछ नहीं मालूम था। यहां बेटा स्कूल गया वहां हम भी शिवा को लेने निकल लिए। छोटा होने की वजह से उसके लिए व्हीट सैरेलैक, फोरेक्स मिल्क पाउडर, दवाइयां और सीरींज सब लेकर आए थे।


बेटू जी स्कूल से आए तो हमने शिवा को ऐसे ही जमीन पर दरी के ऊपर लिटा दिया। बेटू अपनी मस्ती में आए और फिर बिना ध्यान दिए ही घर में अपने खेलकूद में जुट गए। हमें बड़ी निराशा हो रही थी कि बेटू शिवा को देख ही नहीं पा रहा था। फिर मैंने उसे बहाने से उस तरफ भेजा जिधर शिवा सो रहा था। अचानक वो वहां जाकर रुका, अरे मम्मी, ये क्या है? मम्मी ये रीयल पपि है! अरे मम्मी ये तो हिलता है!’ ऐसे ही विस्मयसूचक संबोधनों को इस्तेमाल करते हुए वो वहीं पर बैठ गया और उसके साथ खेलने लगा। आज भी दोनों को खेलता हुआ देखती हूं तो अच्छा लगता है।

शिवा एक काले रंग का लेब्राडॉर पपि है। शिवा के बारे में बाकी बातें अगली बार।

खैल रहें है उसके संग,

बन गया वो अपना,

छोटा सा आया है घर में,

एक चंचल सपना।



प्रीती बङथ्वाल तारिका

Friday, September 4, 2009

जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं..........

आज नितीश राज जी (मेरे सपने मेरे अपने) का जन्मदिन है। उन्हें इस अवसर पर जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई । सोचा आज के इस शुभ दिन में अपनी रचना उन्हें तोहफे के रूप में दूं आशा है पसन्द आएगी।









मीठे पल, मीठी यादों का,
साथ हो हरदम, मीठे वादों का,
पलभर को भी गर आए आंसू,
स्वाद हो उनमें, मीठी सांसों का।



ग़म घेरे कभी तुम्हें यूं,
कि अन्धकार आंखों में छाए,
खुशियों की थाली में तुमको,
खिले फूलों की, खुशबू आए।



तुम्हें हो हासिल, सागर की खुशियां,
मिले वो मोती, हो जिनमें दुनियां,
देखे ख्वाब सच्चे हो जाएं,
कुछ खुशियों में मुस्कुराए,
और कुछ खिलखिलाए।



हो तुम्हें मुबारक, साल का ये दिन,
रहे अपनों का साथ हमेशा,
जब भी मुङ कर पीछे देखो,
पाओ अपनों को पास हमेशा।

..............
प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र- साभार गूगल)

Monday, August 31, 2009

देखो चांदनी रात में..........





खोये-खोये से चांद पर,
जब बारिश की बूंदे बैठती,
और बादल की परत,
घूंघट में हो, उसे घेरती,
तब फिसल कर गाल पर,
एक तब्बसुम खिलने लगे,
देखो चांदनी रात में,
अम्बर धरा मिलने लगे।



कुछ मंद-मंद मुस्कान सी,
आंखें चमक बिखेरती,
हाथों की लकीरों पे हो जैसे,
नाम अम्बर फेरती,
यूं धरा का रंग जैसे,
अम्बर के रंग रंगने लगे,
देखो चांदनी रात में,
अम्बर धरा मिलने लगे।



जब प्यार का अमृत बरस के,
गिरता धरा की गोद पर,
और हवाएं छू के बदन को,
भीनी-सी खुशबू बिखेरती,
तब कहीं, रंगीन कलियों का बिछौना,
इस धरा पर बिछने लगे,
देखो चांदनी रात में, “तारिका”
अम्बर धरा, फिर मिलने लगे।
...............
प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र-साभार गूगल)

Saturday, August 29, 2009

कुछ प्यार की बातें होती............





सबसे पहले तो बहुत दिनों बाद आने के लिए आप सभी से माफी चाहूंगी। अब क्या करें कम्प्यूटर ही चलने को राजी नहीं था। जैसे ही ऑन करते शुरू होने से पहले ही बन्द हो जाता। बहुत हाथ जोङने के बाद अब इसका मूड ठीक हुआ है तो इससे पहले कि ये दुबारा बिदके अपनी पोस्ट डाल रही हूं ।




कुछ प्यार की बातें होती,
तो अच्छा था,
कुछ टकरार की बातें होती,
तो अच्छा था,
मन मचल-मचलता होता,
तो अच्छा था,
कुछ दिल भी थिरकता होता,
तो अच्छा था,
कहना तुम भी चाहते,
और हम भी थे,
बस बात शुरू तो होती,
तो अच्छा था,
यूं बीत गया चुपके से,
ये सारा दिन,
ये दिन ना बीता होता,
तो अच्छा था।
कुछ प्यार की बातें होती,
तो अच्छा था।
..............
प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र- साभार गूगल)

Friday, August 7, 2009

कहीं खोया हुआ अपना, वो सामान मिल जाए............






कहीं खामोश पन्नों पे,
बीते लम्हों की कहानी,
बदलते वक्त की हसरत,
बदलती जिन्दगानी।



मुसाफिर भी बने इसमें,
हमसफर भी बनने आये,
मुकद्दर में ही, न था जो,
वो, दर से ही लौट आये।



पत्थर के मकां भी थे,
मिट्टी की मजारें भी,
दरारें उसमें भी उतनी ही,
दरारें इसमें थी जितनी।



पिघलती रूह में अक्सर,
अक्श अपना दिखाई दें,
मचलते दिल की वो हसरत,
दबी चीखें सुनाई दें।



फिर से, यूं ही चलेंगे हम,
लेके अपने, ख्वाबों का पिटारा,
शायद यूं ही “तारिका”
कोई खोया हुआ अपना,
कहीं सामान मिल जाए।
.............
प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र - साभार गूगल)

Friday, July 31, 2009

शायद ये ख्वाब वाली, नई उम्र हो जैसे..........





जिस रात में, मिली थी,
मुझसे मेरी महोब्बत,
उस रात ही कहीं पे,
दिल खो दिया था मैंने।



बन फूल, खिल रही थी,
तितली-सी उङ रही थी,
होठों की एक हंसी ने,
मन छू लिया हो जैसे।



बिन घुंघरूओं के बजती,
पैरों में अब तो पायल,
मैं नाचती थिरकती,
दिल झूमता है ऐसे।



लगने लगा है सबकुछ,
अब तो नया-नया सा,


शायद ये ख्वाब वाली,
नई उम्र हो जैसे।

.............

प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र - साभार गूगल)

Wednesday, July 29, 2009

जैसे अमावस का चांद हो.........



समीर जी (उङनतश्तरी) को जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाऐं। आप हमेशा हमारी होसला अफजाई करते रहे और हमें टिपियाते रहें। मोतीचूर का बहुत बङा लड्डू हमारी और से आपके लिए।









हम ढूंढते रहते है,
नज़रें उठाके उसको,
जाने कहां छुपके बैठा है,
वो, बादल की ओट में।



पत्थरा गई ये आंखे,
इंतज़ार में उसकी,
वो फिर भी बनके बैठा है,
जैसे अमावस का चांद हो।



जो हम भी रूठ जाएं,
तो न खिल सकोगे तुम भी,
आखिर तेरी खुशबू का,
वो खिलता फूल, मैं ही हूं।



मुश्किल से ही मिली है,
दिल को धङकने की महोलत,
तू देर न कर अब आजा,
ये सांस थम रही है।



बस ये आखरी सदा है,
आना है तो आ जा,
न फिर जवाब होगा,
तेरे, किसी भी सवाल का।


.............


प्रीती बङथ्वाल "तारिका"


(चित्र- साभार गूगल)

Tuesday, July 28, 2009

.......मेरी आशायें.......





अपनी मुठ्ठी में,
बादलों को बांधती हूं,
क्योंकि मैं उङना चाहती हूं।


अपनी उंगलियों में,
सितारें सजाती हूं,
क्योंकि मैं उनको छूना चाहती हूं।


अपने होंठों पे,
मोतियों को थामती हूं,
क्योंकि मैं लव्ज़ों को सजाना चाहती हूं।


अपनी आंखों में,
चांद छुपाती हूं,
क्योंकि मैं तारों सा चमकना चाहती हूं।

.............

प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र- सभार गूगल)

Saturday, July 25, 2009

कुछ बातें यादों के झरोखों से.....





कुछ बातें हमेशा याद आती हैं, कुछ खट्टी...कुछ मीठी यादें। यादों के झरोखे उन एहसासों को याद करा देते हैं जो कभी आवेग में लिए गए एक निर्णय को सालों बाद बचकाना कहने पर मजबूर कर देते हैं तो कभी गर्व की अनुभूति करा देते हैं।

आज शाम घर के अंदर की उमस और गर्मी से निजात पाने के लिए मैं अपनी बैडरूम से लगी बाल्कॉनी में आ खड़ी हुई। हवा कम चल रही थी बाहर भी कोई राहत नहीं मिली। बाल्कॉनी से खड़े होकर जब मैंने नीचे देखा तो याद आया पिछला साल। आज ही तीज के दिन पिछले साल हमारी सोसाइटी में इस वक्त तीज का कार्यक्रम हो रहा था। तीज क्वीन जिसे चुना गया था वो थी प्रेसीडेंट की बहू जो बिना अच्छी लुक और परफोर्मेंस (दूसरे प्रतियोगियों के मुकाबले) और बिना कुछ लाग लपेट के तीज क्वीन बना दिया गया था। बाद में कितना विरोध हुआ था इसका। सभी लेडीज और साथ ही पब्लिक तक ने बाद में इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। पर उस विरोध ने इस बार सोसाइटी को उस कार्यक्रम से महरूम कर दिया। इस बार सोसाइटी में तीज पर झूले, झूले गए पर बच्चों के पार्क में। छोटे-छोटे मासूम भी सोच रहे होंगे कि आज आंटियों को हुआ क्या है।

ये सोचते हुए मैं अंदर चली आई। तभी सामने रखा एक कार्ड देखा, कार्ड हाथ में लिया और पता नहीं कैसे उसे छूते ही पिछली याद से निकलकर यादों ने इस तरफ का रुख कर लिया।

कुछ दिन पहले, रात बारह बजने में महज एक मिनट बाकी था। एक मिनट की दूरी पर था मेरा जन्मदिन लेकिन कंप्यूटर पर पति देव चिपके हुए थे और बेटा मस्त था अपने कार के खिलौनों के साथ। मैं किताब पढ़ रही थी और साथ ही टीवी पर गाने लगा रखे थे। ठीक एक मिनट बाद दिल में एक लहर सी उठी। पर वो लहर दिल तक ही सीमित रही। कोई भी हिला ही नहीं। मैंने पांच-दस मिनट इंतजार किया पर ये क्या अब भी कोई नहीं हिला। जबकि हर बार काउंटडाउन शुरू हुआ करता था और दोनों विश करते थे। मैंने गुस्से में टीवी बंद किया, किताब रखी, लाइट बंद की और सोने लगी। थोड़ी देर बाद दोनों को याद आया और दोनों बड़ी देर तक मुबारकबाद देते रहे।

सुबह से ही लगा था कि कोई ना कोई सरप्राइज मिलेगा ही पर सुबह से शाम होगई और कुछ गिफ्ट क्या दोनों ने बात तक नहीं की इस सिलसिले में। बस सुबह से अपनों के फोन जरूर आए। गुस्सा तो बहुत आया पर शाम को दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो देखा कि मेरा बेटा हाथ में चॉकलेट सेलिब्रेशन पैक लेकर खड़ा हुआ है, बोला हैप्पी बर्थ डे मम्मा। जब तक अपनी आंखों की नमी को संभालती तब तक पति देव ने मेरी मनपसंद मिठाई का डिब्बा मेरे सामने करते हुए मुझे बधाई दी। थोड़ा रुक कर, संभलकर खुशी का पता चला...सुबह से बुझा-बुझा था मन अब जाकर कुछ प्रफुल्लित हुआ। मैंने दोनों के कान पकड़े और बोली कि क्या ये सब सुबह नहीं कर सकते थे मेरा दिन तो सही गुजरता।

दोनों ने कहा कि ये तो कुछ भी नहीं, अभी तो फिल्म बाकी है मेरे दोस्त....।....और भी सरप्राइज ! मैं अब ज्यादा सरप्राइज थी। लेकिन मुझे क्या पता था कि दोनों के दोनों सच में मुझे सरप्राइज करने वाले थे। हम निकल पड़े घूमने के लिए, हम काफी घूमें और फिर जब खाने की बात आई तो हम अपनी मनपसंद जगह पर गए और एक यादगार डिनर किया। जब बिल आया, तो ये क्या, बिल मेरे सामने कर दिया गया। ऐसा लगा कि सब मुझे ही देख रहे हैं, अब करती क्या ना करती, मुझे बिल पे करना पड़ा। दोनों मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे और उनकी इस शरारत ने मेरे चहरे पर हंसी बिखेर दी।
मैंने चॉकलेट की लास्ट बाइट ली और सेलिब्रेशन पैक में रैपर को वापस डालकर डिब्बे को एक बार फिर से देखा। अभी तक लग रहा था कि बेटे के हाथों की खुशबू उसमें बसी हुई है। कभी-कभी यादों के वो पल, अच्छे, बड़े अपने से लगते हैं।

प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

(चित्र- साभार गूगल)

Friday, July 10, 2009

यूं ख्वाब रोज सजाया करो...........

जो होंठो को मुस्कान दे,
उन्हीं लम्हों को,
आंखों में बसाया करो,
सलवटें न पङ जाए,
उनमें कभी,
इन्हें रोज सुलझाया करो,
ख्वाब ही तो हैं मासूम से,
धुंधले न हो जाए कहीं,
ये ख्वाब रोज,
पलकों पे सजाया करो।
..........
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Thursday, July 2, 2009

जब बारिश भीग रही थी..........

सुबह हुई तो देखा,
बारिश भीग रही थी,
हम भी भीग रहे थे,
तन्हाई भीग रही थी।



जब-जब देखूं उसको,
वो शरमा-शरमा जाती,
लाली सी हो जाती,
बिजली चमका जाती।



मन देख-देख यूं उसको,
मयूरा डोल रहा था,
हरी-हरी धरा पर,
हर पत्थर बोल रहा था।


सूरज की आंखे कैसे,
धुंधला-धुंधला सी जाती,
जब काली-काली बदरा,
सूरज के आगे आती।
.............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Tuesday, June 30, 2009

शु्क्र है फिर भी आये तो...........

देर लगी आने में तुमको,
शुक्र है फिरभी आये तो....
तङप रहे थे जिस मौसम को,
वो काली बदरा छायी तो।


रिमझिम-रिमझिम फुहारों में,
ठण्डी पुरवाई है संग...,
आओ भीगे इन बूंदो में,
खेले बचपन वाले रंग।



चहकें चिङिया, मोर नाचते,
हम भी होले इनके संग,
पैर थिरकते, ताल बजाते,
जब बारिश देती है, सरगम।



गर्म-गर्म चाय के प्याले,
साथ में समोसे, गर्म-गर्म,
पकौङे तल रहे, घर के अन्दर,
इंतजार कर रहे, बारिश में हम।
..............
प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र- साभार गूगल)

Monday, June 29, 2009

दबे पांव आने दो बदरा...........





हे सूरज महाराज......
गर्मी को बरसाओ ना यूं ,
पत्थर सा सिकवाओ ना यूं ,
दबे पांव आने दो बदरा,
पानी-पानी को तरसाओ ना यूं ।


ना मुसकाते रहो यूं अकेले,
खङी धूप में, बिन सहेले,
तुमको होगी कसम चांदनी की,
दिन में तारे, दिखलाओ ना यूं ,
दबे पाव आने दो बदरा,
पानी-पानी को तरसाओ ना यूं ।



तुमभी अगन में तपे हो,
कई बरसों के प्यासे रहे हो,
थोङा रुकलो, तो आराम कर लो,
तुमभी खुद को सुखाया करो यूं ,
दबे पांव आने दो बदरा,
पानी-पानी को तरसाओ ना यूं ।
...............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Saturday, June 27, 2009

यूं सामना खुद का खुदी से हो गया.....

सोचा न था.....,
यूं जिन्दगी से धोखा हो गया,
यूं सामना,
जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।।
रब मिल गया था सोच कर,
खुश हो लिए,
आंखे खुली तो,
रब न जाने कहां खो गया,
यूं सामना,
जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।।
दिल दर्द के,
समन्दर में डूबा जा रहा,
आंखे भी छलक कर,
खाली हो रही,
भर रहे थे,
जो उङाने बादलों में,
टूट कर वो सपना,
सौ टुकङे हो रहा,
यूं सामना,
जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।।
पत्थरों से रगङती,
उस नाम को,
जो हरकदम मेरा,
हमराज़ था,
बन रहा वो आज,
मेरी आंखो में नमी,
कलतलक,
जो दिल के पास था,
यूं सामना,
जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।।
.............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Saturday, June 13, 2009

मेरा सागर........

"जिसके लिए इसबार की रचना लिखी है उसी के हाथों से बनी पेंटिंग इसबार पिक्चर में लगाई है आपको भी जरुर पसन्द आयेगी। उसने अपनी मन पसन्द चीज यानी कि कार को इस पिक्चर में बनाया है।"
प्यारी और मासूम है सूरत,
पर मन चंचल है,
सच्चे दिल का शहजादा है,
और नटखट है,
एक बात की बात बनाकर
वो रखता है,
अपनी बातों में उलझाकर
वो रखता है,
तुतलाता है बात-बात पर
गुस्साता है,
थोङा सा भी प्यार करो तो
खिल जाता है,
प्यार बहुत करता है मुझसे
वो जतलाता है,
बार-बार वो गले से मेरे लग
जाता है,
देख उसे मन की चिन्ताऐं
मिट जाती हैं,
अंधकार की सभी घटायें
छट जाती है।
...........
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

Wednesday, May 20, 2009

मासूम-सा दिल है ऐ "तारिका".......

कितनी बदल गई तस्वीरें,
क्या थी खुशियां क्या थे गम,
खुद को ही न पहचान सके,
जब टकराये खुद से ही हम।


जब-जब याद करें वो लम्हें,
आंखें भूल गई ज्योती,
टूटे माला के मनको-सी,
टपक रहे मन के मोती।



सपने रह-रह तङपाते हैं,
अफसाने....बस बन जाते हैं,
जैसे कोरे कागज में रखी हो,
अपनी कोरी बात कोई।



दीवारों मे चिन जाए यादें,
कोई तो ऐसा जतन करें,
मासूम-सा दिल है,
बहल जाएगा, ऐ “तारिका”
फिर कुछ मीठा सुन करके।
.............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका "
(चित्र - साभार गूगल)

Monday, May 18, 2009

देखो-देखो ये महाकाल..........

नेताओं ने, फेंका जाल,
फसी है जनता, बुरे हाल,
महंगाई की, पङी है मार,
देखो-देखो, ये महाकाल।


लूटपाट का, बना माहोल,
बाद में लूटे, पहले मांगे वोट,
बाहर खोलें, एक दूजे की पोल,
अन्दर सबका, डब्बा गोल।


तुम भी पेट भरो रे भैया,
हम भी माल दबायेंगे,
जनता भोली बहकादेंगे,
मिलके माल उङायेंगे।
...........
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Friday, May 15, 2009

तुम दीया हो, मैं हूं बाती सनम........

हम एक सफर के,
साथी सनम,
तुम दीया हो,
मैं हूं बाती सनम,
दिल के चमन में,
जब खिलते गुलाब,
कांटों के संग,
खुशबू आती सनम।



जीवन में साथ,
निभाने की कसमें,
पत्थर में,
नाम लिखाने की रसमें,
वो दरख़तों के नीचे,
शाम बितानी सनम,
हम एक सफर के,
साथी सनम,
तुम दीया हो,
मैं हू बाती सनम।



खुली धूप में,
छत पे बातें बनाना,
कभी पलके उठना,
कभी, शरमा के झुकाना,
नजरों की नजर से,
आंखे बचाना,
यूं ही छुप-छुप के,
अपना मिलना सनम,
हम एक सफर के,
साथी सनम,
तुम दीया हो,
मैं हूं बाती सनम।
...........
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Tuesday, May 12, 2009

मैं लहर हूं, सागर में खो जाती हूं............

सच कहना
क्या तुम भी मेरा,
दर्द समझते हो?
पत्थर से टकराना,
फिर बहजाना,
क्या अर्थ समझते हो?
न मिल पाना अपनों से,
घुट कर रह जाना,
जीवन है संघर्ष मेरा,
न कुछ पाना,
बस खोते जाना,
क्या ये सच, समझते हो?


मैं रोऊं भी तो,
क्यों कर,
न इसका एहसास तुम्हे होगा।
तुम समझ के बैठे हो,
मै इठलाती हूं,
पर न जान सके,
मैं पास जो आना चाहूं,
तो भी टकराके बहजाती हूं।
मैं लहर हूं ,
सागर में खो जाती हूं।
..............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Sunday, May 10, 2009

दिल ढूंढता है फिर वही...........

दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।
जिसकी छाया में
सारे दिन की थकान,
छूमंतर हो जाती।
जिसके हाथों की गरमाहट,
माथे को सहलाती,
अपने होने का
एहसास कराती,
और हर मुश्किल
आसान हो जाती।
दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।

कुछ कहने से पहले ही,
सब कुछ समझ जाती,
मन की इच्छाओं को,
भांप जाती,
गलती होने पर,
कभी डांटकर तो कभी, प्यार से समझाती,
दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।
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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)


Tuesday, May 5, 2009

मैं प्यार का समन्दर..........



अहसास में, डुबो कर,
प्यार की, कलम से,
लिख दिए, जज़्बात,
जो खिल रहे, कमल से।



मैं डोर से बंधी हूं,
तेरे प्यार का है बंधन,
तुम डूब जाओ मुझमें,
मैं प्यार का समन्दर।



मैं मोम-सी पिघल कर,
तेरी सांसों में बसूंगी,
तुम जबभी पलके मूंदों,
बस मैं ही मैं दिखूंगी।



दिल कह रहा है तुमसे,
बस याद मुझको आना,
वर्ना यूं अनबन होगी,
मेरी नजर की, तेरी नजर से।

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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

(चित्र- साभार गूगल)

Monday, April 27, 2009

कभी वक्त मिले मुझसे, तुम मिलने आ जाना.....

जज़्बात महोब्बत के,
सीने में धङकते हैं,
फुरसत में कभी तुम भी,
इससे सुनने आ जाना।
मैं तन्हा हूं फिर भी,
कुछ बाते करती हूं,
कभी वक्त मिले,
मुझसे,
तुम मिलने आ जाना।



रह-रह के मचलता र्है,
आंखों में जो बसता है,
वो सपना बनकर के,
तुम मुझको सुला जाना।
मैं नींद में रहकर भी,
कुछ देखा करती हूं,
तुम पास मेरे आकर,
कभी मुझको जगा जाना।



फिर खोल के जुल्फों को,
सुलझाने बैठूं तो,
तुम अपने हाथों से,
इनको सहला जाना।
इन काले केसू में,
कुछ सूनापन सा है,
एक फूल महोब्बत का,
चुपके से लगा जाना।



बारिश के मौसम में,
जब भीग रहे हो तुम,
बस अपना समझकर के,
मुझे पास बुला लेना,
मैं आदत से अपनी,
कुछ शरमा जाऊं तो,
तुम बाहों में भरकर,
मुझे गले लगा लेना।
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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)