Tuesday, June 30, 2009

शु्क्र है फिर भी आये तो...........

देर लगी आने में तुमको,
शुक्र है फिरभी आये तो....
तङप रहे थे जिस मौसम को,
वो काली बदरा छायी तो।


रिमझिम-रिमझिम फुहारों में,
ठण्डी पुरवाई है संग...,
आओ भीगे इन बूंदो में,
खेले बचपन वाले रंग।



चहकें चिङिया, मोर नाचते,
हम भी होले इनके संग,
पैर थिरकते, ताल बजाते,
जब बारिश देती है, सरगम।



गर्म-गर्म चाय के प्याले,
साथ में समोसे, गर्म-गर्म,
पकौङे तल रहे, घर के अन्दर,
इंतजार कर रहे, बारिश में हम।
..............
प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र- साभार गूगल)

9 comments:

  1. बहुत सुंदर ढंग से आप ने बरखा रानी का स्वागत किया, बहुत सुंदर लगी आप की कविता.
    धन्यवाद

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  2. बहुत खूबसूरत तरीके स्वागत की तैयारी है बारिश की. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  3. वो काली बदरा छायी तो।

    इसे-

    वो काले बदरा छाये तो।

    करके देखो, बेहतर लगेगा. भाव बहुत बढ़िया हैं गीत के.

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  4. सुदर भावों की रोचक प्रस्‍तुति .. बहुत बढिया।

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  5. वाह वाह जी..बरखा राही निश्चित ही ..इस बार तो ऐसे शानदार स्वागत की हकदार हैं....बस वो पकोडे थोड़े ज्यादा बनवा लेना आप...सूना है ब्लॉगर पेटू होते हैं..कहीं भी शुरू हो जाते हैं..और पकोडों की तो....बात ही क्या..

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  6. बादलों को पता होता चाय,समोसे का जुगाड़ है तो पहले ही आ जाते। :)

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  7. आखिर रिमझिम रिमझिम बारिश आ ही गयी .... हम तो आज जी भर के भीगे

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