Wednesday, November 11, 2009

आओ देखें इक स्वप्न नया........







आओ देखें इक स्वप्न नया,
नई रचना हों, नई उम्मीदें,
 छोटी-छोटी सी ख्वाहिशें हो, 
हो अपनों की खुशियां जिनमें।





 पल-पल के सपने तैर रहे, 
छोटी-छोटी आशाओं में, 
मन मचल रहा छूने को यूं, 
हो सीप में,... कोई मोती जैसे।






ठण्डी में सौंधी-सी धूप खिले, 
हर तरफ हों नन्हें फूल खिलें, 
तितली में, हों कई रंग भरे, 
ख्वाबों में भी लगे पंख नये।
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प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र साभार गूगल)
 



Thursday, October 29, 2009

मेरे बिस्तर के सिरहाने.............







न पूछो क्यों, हम नींद में, 
हंसते हैं, और कभी रोते हैं, 
ख्वाब में अक्सर........,  
दर्द की यादों में, तो कभी,  
खुशियों की महफलों में होते हैं।



यूं ही मिलते हैं हम,  
जमाने से मुलाकातों में, 
वर्ना तो मिलने में ही,  
जमाने होते हैं, 
खूबसूरत सी मुलाकात हुई हो कोई, 
बस वही ख्वाब.........,  
बिस्तर के सिरहाने होते हैं।
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 प्रीती बङथ्वाल तारिका  
(चित्र साभार गूगल)


Monday, September 28, 2009

कुछ कहते हुए.....ख़्वाब





कुछ कहते हुए....ख़्वाब, 
कुछ सुनते हुए....ख़्वाब, 
चलो इन ख़्वाबों को, 
आज अपना बनालूं,



कहदूं इन्हें दिल के,
 वो सारे जज़्बात, 
और आंखों में अपनी, 
मैं इनको सजा लूं,



 जब खोल के देखूं, 
मूंदी हुई पलकें, 
और सामने बैठे हो, 
कुछ कीमती सपनें,


कह दूं उन्हें भी, 
हैं ये भी कुछ अपने, 
लो संग इन्हें भी, 
दर्पण में समा लो,



 कुछ कहते हुए......ख़्वाब, 
कुछ सुनते हुए......ख़्वाब,
 चलो इन ख्वाबों को, 
आज अपना बना लूं।

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प्रीती बङथ्वाल तारिका 
(चित्र- साभार गूगल)