Wednesday, November 11, 2009
आओ देखें इक स्वप्न नया........
Thursday, October 29, 2009
मेरे बिस्तर के सिरहाने.............
Monday, September 28, 2009
कुछ कहते हुए.....ख़्वाब
Monday, September 21, 2009
मां पार लगा दे नैया....
Tuesday, September 8, 2009
“शिवा”
हमारे घर में एक नये मेहमान का आगमन हुआ। वो अभी सिर्फ एक महीना नौ दिन का ही है। बहुत ही प्यारा है। जब से घर में आया है तब से ही सबका चहेता बना हुआ है। सभी उसके साथ खेलते है, उसकी हर हरकत पर खुश होते हैं। वैसे वो अधिकतर मेरे पास ही रहता है, मेरी आवाज को पहचानता है। अब अपना नाम भी पहचानने लगा है। उसका नाम “शिवा” है।
पहली बार जब उसे देखा था तो वो केवल तेरह दिन का था। बहुत ही छोटा, आंखे भी नहीं खुली थी शिवा की, और चलना, तो दूर की बात। उसे जब अपने हाथों में लिया तो उस पर प्यार छलक उठा, बस यही वाला पसन्द है ये सोच कर मैने इनकी ओर देखा। ये मुझे देखते ही समझ गये कि मुझे ये पसन्द आ गया है। उसने उसी दिन मेरे हाथों में पहली बार आंखे खोली थी। मेरा मन उस पर आ चुका था मैने उसे लेने का फैसला कर लिया।
उसे हम अपने साथ नहीं ला सकते थे क्योंकि वो अभी बहुत छोटा था। उसे छोङ कर आने का मन नहीं कर रहा था, लेकिन जैसे-तैसे मन को समझा कर हम घर लौट आये। लेकिन घर आने के बाद भी मेरी जुबान पर उसकी ही बातें चल रही थी। “वो कितना प्यारा था, उसने मेरी हाथों पर ही पहली बार अपनी आंखे खोली थी। हम उसका नाम क्या रखेगें”। मैं तो जैसे उस नन्हें के बारे में सोच-सोच कर ही दिन काट देती थी। ये सारी बातें मेरे पतिदेव को बार-बार सुनने को मिल रही थी।
मेरी उत्सुकता को देखते हुए पतिदेव ने जल्द ही उसे लाने का फैसला कर लिया। जब वो बीस दिन का हो गया तो हम उसे लेने के लिए गये उसकी हलचलों में थोङा फर्क था वो गिर-गिर के चलने लगा था। अभी शुरुवात थी चलने की और मां के दूध के साथ बोतल से भी दूध पीने लगा था। इसका मतलब था कि अब हम उसे अपने साथ ला सकते थे और हम उसे अपने साथ ले आए। उसका नाम मैंने “शिवा” रखा। घर में सभी को (पतिदेव और बेटे को) ये नाम पसन्द आया।
जिस दिन हमने शिवा को लाने का फैसला किया, सुबह बेटा स्कूल जा चुका था। बेटे को सरप्राइज गिफ्ट के रूप में हम “शिवा” देना चाहते थे। अभी तक शिवा का नाम तो बेटा जानता था, पर ये शिवा है क्या, इस बारे में उसे कुछ नहीं मालूम था। यहां बेटा स्कूल गया वहां हम भी शिवा को लेने निकल लिए। छोटा होने की वजह से उसके लिए व्हीट सैरेलैक, फोरेक्स मिल्क पाउडर, दवाइयां और सीरींज सब लेकर आए थे।
बेटू जी स्कूल से आए तो हमने “शिवा” को ऐसे ही जमीन पर दरी के ऊपर लिटा दिया। बेटू अपनी मस्ती में आए और फिर बिना ध्यान दिए ही घर में अपने खेलकूद में जुट गए। हमें बड़ी निराशा हो रही थी कि बेटू “शिवा” को देख ही नहीं पा रहा था। फिर मैंने उसे बहाने से उस तरफ भेजा जिधर “शिवा” सो रहा था। अचानक वो वहां जाकर रुका, ‘अरे मम्मी, ये क्या है? मम्मी ये रीयल पपि है! अरे मम्मी ये तो हिलता है!’ ऐसे ही विस्मयसूचक संबोधनों को इस्तेमाल करते हुए वो वहीं पर बैठ गया और उसके साथ खेलने लगा। आज भी दोनों को खेलता हुआ देखती हूं तो अच्छा लगता है।
“शिवा” एक काले रंग का लेब्राडॉर पपि है। “शिवा” के बारे में बाकी बातें अगली बार।
“खैल रहें है उसके संग,
बन गया वो अपना,
छोटा सा आया है घर में,
एक चंचल सपना।”
प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
Friday, September 4, 2009
जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं..........

साथ हो हरदम, मीठे वादों का,
पलभर को भी गर आए आंसू,
स्वाद हो उनमें, मीठी सांसों का।
ग़म न घेरे कभी तुम्हें यूं,
कि अन्धकार आंखों में छाए,
खुशियों की थाली में तुमको,
खिले फूलों की, खुशबू आए।
तुम्हें हो हासिल, सागर की खुशियां,
मिले वो मोती, हो जिनमें दुनियां,
देखे ख्वाब सच्चे हो जाएं,
कुछ खुशियों में मुस्कुराए,
और कुछ खिलखिलाए।
हो तुम्हें मुबारक, साल का ये दिन,
रहे अपनों का साथ हमेशा,
जब भी मुङ कर पीछे देखो,
पाओ अपनों को पास हमेशा।
Monday, August 31, 2009
देखो चांदनी रात में..........

जब बारिश की बूंदे बैठती,
और बादल की परत,
घूंघट में हो, उसे घेरती,
तब फिसल कर गाल पर,
एक तब्बसुम खिलने लगे,
देखो चांदनी रात में,
अम्बर धरा मिलने लगे।
कुछ मंद-मंद मुस्कान सी,
आंखें चमक बिखेरती,
हाथों की लकीरों पे हो जैसे,
नाम अम्बर फेरती,
यूं धरा का रंग जैसे,
अम्बर के रंग रंगने लगे,
देखो चांदनी रात में,
अम्बर धरा मिलने लगे।
जब प्यार का अमृत बरस के,
गिरता धरा की गोद पर,
और हवाएं छू के बदन को,
भीनी-सी खुशबू बिखेरती,
तब कहीं, रंगीन कलियों का बिछौना,
इस धरा पर बिछने लगे,
देखो चांदनी रात में, “तारिका”
अम्बर धरा, फिर मिलने लगे।
Saturday, August 29, 2009
कुछ प्यार की बातें होती............

कुछ प्यार की बातें होती,
तो अच्छा था,
कुछ टकरार की बातें होती,
तो अच्छा था,
मन मचल-मचलता होता,
तो अच्छा था,
कुछ दिल भी थिरकता होता,
तो अच्छा था,
कहना तुम भी चाहते,
और हम भी थे,
बस बात शुरू तो होती,
तो अच्छा था,
ये सारा दिन,
ये दिन ना बीता होता,
तो अच्छा था।
कुछ प्यार की बातें होती,
तो अच्छा था।
Friday, August 7, 2009
कहीं खोया हुआ अपना, वो सामान मिल जाए............

बीते लम्हों की कहानी,
बदलते वक्त की हसरत,
बदलती जिन्दगानी।
मुसाफिर भी बने इसमें,
हमसफर भी बनने आये,
मुकद्दर में ही, न था जो,
वो, दर से ही लौट आये।
पत्थर के मकां भी थे,
मिट्टी की मजारें भी,
दरारें उसमें भी उतनी ही,
दरारें इसमें थी जितनी।
पिघलती रूह में अक्सर,
अक्श अपना दिखाई दें,
मचलते दिल की वो हसरत,
दबी चीखें सुनाई दें।
फिर से, यूं ही चलेंगे हम,
लेके अपने, ख्वाबों का पिटारा,
शायद यूं ही “तारिका”
कोई खोया हुआ अपना,
कहीं सामान मिल जाए।
Friday, July 31, 2009
शायद ये ख्वाब वाली, नई उम्र हो जैसे..........

जिस रात में, मिली थी,
मुझसे मेरी महोब्बत,
उस रात ही कहीं पे,
दिल खो दिया था मैंने।
बन फूल, खिल रही थी,
तितली-सी उङ रही थी,
होठों की एक हंसी ने,
मन छू लिया हो जैसे।
बिन घुंघरूओं के बजती,
पैरों में अब तो पायल,
मैं नाचती थिरकती,
दिल झूमता है ऐसे।
लगने लगा है सबकुछ,
अब तो नया-नया सा,
शायद ये ख्वाब वाली,
नई उम्र हो जैसे।
.............
प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र - साभार गूगल)
Wednesday, July 29, 2009
जैसे अमावस का चांद हो.........

नज़रें उठाके उसको,
जाने कहां छुपके बैठा है,
वो, बादल की ओट में।
पत्थरा गई ये आंखे,
इंतज़ार में उसकी,
वो फिर भी बनके बैठा है,
जैसे अमावस का चांद हो।
जो हम भी रूठ जाएं,
तो न खिल सकोगे तुम भी,
आखिर तेरी खुशबू का,
वो खिलता फूल, मैं ही हूं।
मुश्किल से ही मिली है,
दिल को धङकने की महोलत,
तू देर न कर अब आजा,
ये सांस थम रही है।
बस ये आखरी सदा है,
आना है तो आ जा,
न फिर जवाब होगा,
तेरे, किसी भी सवाल का।
Tuesday, July 28, 2009
.......मेरी आशायें.......

बादलों को बांधती हूं,
क्योंकि मैं उङना चाहती हूं।
अपनी उंगलियों में,
सितारें सजाती हूं,
क्योंकि मैं उनको छूना चाहती हूं।
मोतियों को थामती हूं,
क्योंकि मैं लव्ज़ों को सजाना चाहती हूं।
अपनी आंखों में,
क्योंकि मैं तारों सा चमकना चाहती हूं।
Saturday, July 25, 2009
कुछ बातें यादों के झरोखों से.....

आज शाम घर के अंदर की उमस और गर्मी से निजात पाने के लिए मैं अपनी बैडरूम से लगी बाल्कॉनी में आ खड़ी हुई। हवा कम चल रही थी बाहर भी कोई राहत नहीं मिली। बाल्कॉनी से खड़े होकर जब मैंने नीचे देखा तो याद आया पिछला साल। आज ही तीज के दिन पिछले साल हमारी सोसाइटी में इस वक्त तीज का कार्यक्रम हो रहा था। तीज क्वीन जिसे चुना गया था वो थी प्रेसीडेंट की बहू जो बिना अच्छी लुक और परफोर्मेंस (दूसरे प्रतियोगियों के मुकाबले) और बिना कुछ लाग लपेट के तीज क्वीन बना दिया गया था। बाद में कितना विरोध हुआ था इसका। सभी लेडीज और साथ ही पब्लिक तक ने बाद में इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। पर उस विरोध ने इस बार सोसाइटी को उस कार्यक्रम से महरूम कर दिया। इस बार सोसाइटी में तीज पर झूले, झूले गए पर बच्चों के पार्क में। छोटे-छोटे मासूम भी सोच रहे होंगे कि आज आंटियों को हुआ क्या है।
ये सोचते हुए मैं अंदर चली आई। तभी सामने रखा एक कार्ड देखा, कार्ड हाथ में लिया और पता नहीं कैसे उसे छूते ही पिछली याद से निकलकर यादों ने इस तरफ का रुख कर लिया।
कुछ दिन पहले, रात बारह बजने में महज एक मिनट बाकी था। एक मिनट की दूरी पर था मेरा जन्मदिन लेकिन कंप्यूटर पर पति देव चिपके हुए थे और बेटा मस्त था अपने कार के खिलौनों के साथ। मैं किताब पढ़ रही थी और साथ ही टीवी पर गाने लगा रखे थे। ठीक एक मिनट बाद दिल में एक लहर सी उठी। पर वो लहर दिल तक ही सीमित रही। कोई भी हिला ही नहीं। मैंने पांच-दस मिनट इंतजार किया पर ये क्या अब भी कोई नहीं हिला। जबकि हर बार काउंटडाउन शुरू हुआ करता था और दोनों विश करते थे। मैंने गुस्से में टीवी बंद किया, किताब रखी, लाइट बंद की और सोने लगी। थोड़ी देर बाद दोनों को याद आया और दोनों बड़ी देर तक मुबारकबाद देते रहे।
सुबह से ही लगा था कि कोई ना कोई सरप्राइज मिलेगा ही पर सुबह से शाम होगई और कुछ गिफ्ट क्या दोनों ने बात तक नहीं की इस सिलसिले में। बस सुबह से अपनों के फोन जरूर आए। गुस्सा तो बहुत आया पर शाम को दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो देखा कि मेरा बेटा हाथ में चॉकलेट सेलिब्रेशन पैक लेकर खड़ा हुआ है, बोला हैप्पी बर्थ डे मम्मा। जब तक अपनी आंखों की नमी को संभालती तब तक पति देव ने मेरी मनपसंद मिठाई का डिब्बा मेरे सामने करते हुए मुझे बधाई दी। थोड़ा रुक कर, संभलकर खुशी का पता चला...सुबह से बुझा-बुझा था मन अब जाकर कुछ प्रफुल्लित हुआ। मैंने दोनों के कान पकड़े और बोली कि क्या ये सब सुबह नहीं कर सकते थे मेरा दिन तो सही गुजरता।
दोनों ने कहा कि ये तो कुछ भी नहीं, अभी तो फिल्म बाकी है मेरे दोस्त....।....और भी सरप्राइज ! मैं अब ज्यादा सरप्राइज थी। लेकिन मुझे क्या पता था कि दोनों के दोनों सच में मुझे सरप्राइज करने वाले थे। हम निकल पड़े घूमने के लिए, हम काफी घूमें और फिर जब खाने की बात आई तो हम अपनी मनपसंद जगह पर गए और एक यादगार डिनर किया। जब बिल आया, तो ये क्या, बिल मेरे सामने कर दिया गया। ऐसा लगा कि सब मुझे ही देख रहे हैं, अब करती क्या ना करती, मुझे बिल पे करना पड़ा। दोनों मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे और उनकी इस शरारत ने मेरे चहरे पर हंसी बिखेर दी।
मैंने चॉकलेट की लास्ट बाइट ली और सेलिब्रेशन पैक में रैपर को वापस डालकर डिब्बे को एक बार फिर से देखा। अभी तक लग रहा था कि बेटे के हाथों की खुशबू उसमें बसी हुई है। कभी-कभी यादों के वो पल, अच्छे, बड़े अपने से लगते हैं।
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)
Friday, July 10, 2009
यूं ख्वाब रोज सजाया करो...........
उन्हीं लम्हों को,
आंखों में बसाया करो,
सलवटें न पङ जाए,
उनमें कभी,
इन्हें रोज सुलझाया करो,
ख्वाब ही तो हैं मासूम से,
धुंधले न हो जाए कहीं,
ये ख्वाब रोज,
पलकों पे सजाया करो।
Thursday, July 2, 2009
जब बारिश भीग रही थी..........
बारिश भीग रही थी,
हम भी भीग रहे थे,
तन्हाई भीग रही थी।
जब-जब देखूं उसको,
वो शरमा-शरमा जाती,
लाली सी हो जाती,
बिजली चमका जाती।
मन देख-देख यूं उसको,
मयूरा डोल रहा था,
हरी-हरी धरा पर,
हर पत्थर बोल रहा था।
सूरज की आंखे कैसे,
धुंधला-धुंधला सी जाती,
जब काली-काली बदरा,
सूरज के आगे आती।
Tuesday, June 30, 2009
शु्क्र है फिर भी आये तो...........
शुक्र है फिरभी आये तो....
तङप रहे थे जिस मौसम को,
वो काली बदरा छायी तो।
रिमझिम-रिमझिम फुहारों में,
ठण्डी पुरवाई है संग...,
आओ भीगे इन बूंदो में,
खेले बचपन वाले रंग।
चहकें चिङिया, मोर नाचते,
हम भी होले इनके संग,
पैर थिरकते, ताल बजाते,
जब बारिश देती है, सरगम।
गर्म-गर्म चाय के प्याले,
साथ में समोसे, गर्म-गर्म,
पकौङे तल रहे, घर के अन्दर,
इंतजार कर रहे, बारिश में हम।
Monday, June 29, 2009
दबे पांव आने दो बदरा...........

गर्मी को बरसाओ ना यूं ,
पत्थर सा सिकवाओ ना यूं ,
दबे पांव आने दो बदरा,
पानी-पानी को तरसाओ ना यूं ।
ना मुसकाते रहो यूं अकेले,
खङी धूप में, बिन सहेले,
तुमको होगी कसम चांदनी की,
दिन में तारे, दिखलाओ ना यूं ,
दबे पाव आने दो बदरा,
पानी-पानी को तरसाओ ना यूं ।
तुमभी अगन में तपे हो,
कई बरसों के प्यासे रहे हो,
थोङा रुकलो, तो आराम कर लो,
दबे पांव आने दो बदरा,
पानी-पानी को तरसाओ ना यूं ।
(चित्र- साभार गूगल)
Saturday, June 27, 2009
यूं सामना खुद का खुदी से हो गया.....
.............
Saturday, June 13, 2009
मेरा सागर........
पर मन चंचल है,
सच्चे दिल का शहजादा है,
और नटखट है,
एक बात की बात बनाकर
वो रखता है,
अपनी बातों में उलझाकर
वो रखता है,
तुतलाता है बात-बात पर
गुस्साता है,
थोङा सा भी प्यार करो तो
खिल जाता है,
प्यार बहुत करता है मुझसे
वो जतलाता है,
बार-बार वो गले से मेरे लग
जाता है,
देख उसे मन की चिन्ताऐं
मिट जाती हैं,
अंधकार की सभी घटायें
छट जाती है।
Wednesday, May 20, 2009
मासूम-सा दिल है ऐ "तारिका".......
क्या थी खुशियां क्या थे गम,
खुद को ही न पहचान सके,
जब टकराये खुद से ही हम।
आंखें भूल गई ज्योती,
टूटे माला के मनको-सी,
टपक रहे मन के मोती।
सपने रह-रह तङपाते हैं,
अफसाने....बस बन जाते हैं,
जैसे कोरे कागज में रखी हो,
अपनी कोरी बात कोई।
दीवारों मे चिन जाए यादें,
कोई तो ऐसा जतन करें,
बहल जाएगा, ऐ “तारिका”
फिर कुछ मीठा सुन करके।
Monday, May 18, 2009
देखो-देखो ये महाकाल..........
फसी है जनता, बुरे हाल,
महंगाई की, पङी है मार,
देखो-देखो, ये महाकाल।
लूटपाट का, बना माहोल,
बाद में लूटे, पहले मांगे वोट,
बाहर खोलें, एक दूजे की पोल,
अन्दर सबका, डब्बा गोल।
तुम भी पेट भरो रे भैया,
हम भी माल दबायेंगे,
जनता भोली बहकादेंगे,
मिलके माल उङायेंगे।
Friday, May 15, 2009
तुम दीया हो, मैं हूं बाती सनम........
साथी सनम,
तुम दीया हो,
मैं हूं बाती सनम,
दिल के चमन में,
जब खिलते गुलाब,
कांटों के संग,
खुशबू आती सनम।
जीवन में साथ,
निभाने की कसमें,
पत्थर में,
नाम लिखाने की रसमें,
वो दरख़तों के नीचे,
शाम बितानी सनम,
हम एक सफर के,
साथी सनम,
तुम दीया हो,
मैं हू बाती सनम।
खुली धूप में,
छत पे बातें बनाना,
कभी पलके उठना,
कभी, शरमा के झुकाना,
नजरों की नजर से,
आंखे बचाना,
यूं ही छुप-छुप के,
अपना मिलना सनम,
हम एक सफर के,
साथी सनम,
तुम दीया हो,
मैं हूं बाती सनम।