Thursday, July 31, 2008

आंसू,गम,और मैं..........



वो देखो, फिर चल पङी खुशियां,
दामन को मेरे झाङ कर,
आंसुओं के सागर में,
ख़ाबों की कश्ती डाल कर,
वो देखो, चल पङी खुशियां,
दामन को मेरे झाङ कर।
फिर वही ग़म,
जो पहले भी मेरे साथ था,
पहले से भी ज्यादा जिसमें,
दर्द का आभास था,
वो पलकें जो आंसुओं को,
कब से थामे हुई थी,
आज फिर उनमें,
नमी का एहसास था,
अब वही मैं थी, वही आंसू,
वही ग़मों ने घेरा था,
आज मेरे पास सिर्फ यादें थी,
और यादों का बसेरा था।
सिर्फ यादों का बसेरा था ।।
..........

प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

16 comments:

  1. Such a nice blog. I hope you will create another post like this.

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  2. अच्छी कविता...आगे आपसे और भी उम्मीदें है।

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  3. याद न जाए, बीते दिनों की
    जाके न आये जो दिन, दिल क्यूँ बुलाए, उन्हें
    दिल क्यों बुलाए
    याद न जाये ...
    रफी साहब की ये पंक्तियां आपको कमेंट के रूप में इसलिए दी हैं कि आपकी कविता बेहतरीन है काबिले तारीफ है बहुत ही अच्‍छा और दिल को छू लेने वाली कविता होती हैं आपकी बहुत बहुत बधाई हो प्रीती जी

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  4. बहुत उम्दा... बेहतरीन...
    बहुत खूब.

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  5. वो पलकें जो आंसुओं को,
    कब से थामे हुई थी,
    आज फिर उनमें,
    नमी का एहसास था,
    अब वही मैं थी, वही आंसू,
    सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  6. वो देखो, फिर चल पङी खुशियां,
    दामन को मेरे झाङ कर,

    बहुत ही उम्दा।

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  7. वाह क्या खूब लिखा है, आप खूब लिखती हैं...ऐसे ही जारी रखिएगा प्रीती जी

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  8. अच्छा है. बधाई. लिखती रहें.

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  9. वाकई सुंदर, उम्दा

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  10. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति....

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  11. सुन्दरतम !
    शुभकामनाएं !!

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  12. मेरे बाद भी होंगे ये ख्वाब,
    जो मेरी आंखों में, हैं अभी,
    .................
    ..................
    ओंस की बूंदों की आंखों से,
    नमी को चुराकर,
    सांस लेगे, वो फिरसे,
    इस ज़मी और इन वादियों में,

    .....................
    ये ख्वाब......, मेरे बाद भी होंगे.....
    .............
    बहुत ही खुबसूरत अंदाज़ है आपका.शब्दों के साथ साथ चित्रों का इस्तेमाल सोने पे सुहागा लग रहा है .बधाई हो

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