Wednesday, July 9, 2008

कुछ पन्ने मेरी किताब के...

भाग २-इंतजार अपनों का



कहानी को आगे बढ़ाते हुए....

‘सितम को नत मस्तक जालिम को रुसवा हम भी देखेंगे,
चल-ऐ-अज्में बगावत चल, तमाशा हम भी देखेंगे’।

साल का पहला दिन ही मेरे लिए खुशियों की सौगात लेकर आया। मुझे खुद के लिए कम अपने बेटे के लिए ज्यादा खुशी हो रही है। हमारे घर पर, मेरे घर से पहली बार मेरे कुछ करीबी रिश्तेदार मिलने आ रहे हैं। मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। साल के पहले ही दिन मेरे अपने, मुझसे और मेरे बेटे से मिलने आएं चाहे वो थोड़े समय के लिए ही आएं महज़ एक या दो घंटे के लिए। लगता है ये साल मेरे जीवन में फिर से खुशियां ही खुशियां भर देगा। उनके आने का संदेशा मिल गया था सो मेने सुबह ही खीर बना ली। अब बाकी था तो सिर्फ और सिर्फ इंतजार। मेरे अपनों का इंतजार, मेरे अपने के लिए। जल्दी-जल्दी घर का सारा काम खत्म किया और फिर मैं बॉलकनी में खङे हो कर उनकी राह तकने लगी। एक-एक पल घंटे की तरह लग रहा था। जब भी अपनों को आने में देर होती है तो मन शंकाओं से घिर जाता है । कभी भी सही बात ध्यान नहीं आती। आते हैं तो सिर्फ गलत ही विचार ध्यान में। पहली बार आ रहे हैं पता नहीं रास्ता मिला या नहीं। घर का पता तो सही ही लिखा है ना। कहीं प्लान तो चेंज नहीं हो गया। प्लान चेंज होता तो कोई ना कोई फोन जरूर करता। कहीं मुझे बुरा लगेगा इसलिए फोन ही नहीं कर रहे हों। जहां तक नजर जा सकती थी देखती रही। अंजान की वो लाइनें याद आ रही हैं ‘इंतहां हो गई इंतजार की….’।
अब तो आस भी आंखों का साथ छोड़ने लगी थी। तभी, दूर से दो रिक्शे आते दिखाई दिए। फिर से आंख ने आस का दामन थाम लिया। सवाल सिर्फ ये कि दो-तीन घंटे का इंतजार रंग लाएगा। क्या सच ये वो ही हैं जिनका सुबह से मुझे इंतजार है। क्या ये जो आ रहे हैं मेरे अपने हैं। हां...हां...ये तो वो ही हैं। जिनका इंतजार मुझे कब से था। मेरी आंखें छलछला गई। मैं रोती जारही थी। मेरी आंखें उस धुंधले में भी उनको देखने के लिए तरसने लगी। दिल और दिमाग का संगम तो देखिए मैं रोना भी चाह रही हूं और उन्हें देखना भी। पहली बार आए इस एहसास ने मुझे रोमांचित कर दिया। कभी मैं उन्हें देख हाथ हिलाती तो कभी उसी हाथ से आंखों से निकलते धारा-प्रवाह को पोंछती। रिक्शा मेरे पास आता जा रहा था, मेरे घर का फासला महज कुछ मीटर ही रह गया, तब मैं अपने बेटे को गोदी में लेकर
आई और बोली, ‘देख तो कौन आ रहे हैं, बेटु तेरे अपने तुझे देखने आरहे हैं। मुझे तलाशती उनकीं नजरें इधर-उधर देख रहीं थीं और मैं चौथे फ्लोर अपने बेटे के साथ दोनों हाथों से खुशियां बटोर रही थी। आज मेरे अपने, मेरे पास हैं।
“मेरी आंखों में है इक अब्र का टुकड़ा शायद,
कोई मौसम हो सरेशाम बरस जाता है,
दे तसल्ली जो कोई, आंख छलक उठती है,
कोई समझाए तो दिल..और भी भर आता है।”

जारी है...


प्रीती बड़थ्वाल

6 comments:

  1. Aapki khani ke dono bhag pare.Aapne apni bhavnaoan ko bahut achi terha darshaya hai.Pahle bhag mein dhuk to doosre mein khusi deekhi,achaa lga.Apke likhe sher bhi kafi ache lage.
    ek sher meri taraf se
    "har ek jazbat ko zuban nahi milti,
    har ek aarzu ko dua nahi milti,
    muskan bnaye rakho to dunia hai sath,
    aasuon ko to aankho me bhi panah nahi milti".

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  2. Aap ishi tarah se likhatee rahein..agle bhag ke intezar mein...

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  3. मन की बातें, घर की बातें.
    जैसे हों नश्तर की बातें.
    जीवन देती बदल 'मौदगिल',
    कभी-कभी पल-भर की बातें.

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  4. bhavnaon ko aap khub shabdo mein piroti hain...bas thoda aur alankarit kar de to sone pe suhaga ho jaye...

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