Thursday, July 10, 2008

एक आशियाना थी..........


बदलती तकदीरों का आशियाना थी,
शायद आज भी जिन्दगी मेरी, एक अफसाना थी,
खुशियां थी मगर, तब्बसुम की महक से दूर थी,
सिर्फ मोतियों सी बूंदे थी, जो टीस का तराना थी,
शायद आज भी जिन्दगी मेरी, एक अफसाना थी।
सपने थे जो आंसुओं के संग, बह निकले थे,
जिनका दूर तक न साहिल था, न सहारा था,
टूटी हुई कश्ती थी, जिसका कोई न सहारा था,
शायद आज भी जिन्दगी मेरी, एक अफसाना थी।
शायद आज फिर कोई मुझे दस्तक दे रहा था,
आखों ही आखों में, होले से कुछ कह रहा था,
मैं हूं तेरे साथ, अभी और चलना है तुझे,
अपने टूटे सपनों से उभरना है तुझे,
शायद फिर खुशी, एक बार मुझे बुला रही थी,
मेरी तन्हाइयों की कङी तोङ कर मुस्कुरा रही थी,
शायद यही मेरी जिन्दगी का अफसाना था,
तकदीरों को लोट कर, मेरे पास ही आना था,
शायद आज भी जिन्दगी मेरी, एक अफसाना थी।
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प्रीती बङथ्वाल “तारिका”

7 comments:

  1. अच्छी कविता! वाकई जिंदगी हंसते-गाते, लिखते-पढ़ते, सोचते-विचारते पलों का अफसाना ही तो है..

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  2. सुन्दर !
    घुघूती बासूती

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  3. कल आपके ब्लाग पर आने के बाद मैंने एक शेर और एक मक़ता कहा था, आज पूरी गजल हो गयी. मैं इसे आपको समर्पित करता हूं, मेरे ब्लाग पर पढ़ियेगा और हां आपकी आज की काव्याभिव्यक्ति बहुत सुंदर है आपको बधाई.

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  4. Behtarin!!

    Likhti rahiye. Shubhkamanayen.

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  5. प्यारी रचना. अहसासों से भरी बूंदे...सागर की प्यास को जलती ही जा रही है...लिखते रहिये. अल दा बेस्ट.

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  6. aur bhi karib pahunchiye zindagi ke.chhilkon andar meetha phal hota.
    ittafak se kabhi khatta nikal gaya to kya, aap maan lenge ki sab khatta hi khatta hai.
    yaad rakhna hoga- zindagi ek hi hai, preetiji.

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  7. सुन्दर!

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