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Monday, May 7, 2012

गर उनकी आंखों में......




अब की बारिश में,
ये ख्वाब भीग जाएंगे,
गर उनकी आखों में कहीं,
हम नजर आएंगे।     

वो कहते ही नहीं थे,
जुबा से.....कहानी अपनी,
हम अपनी कहानी में,
….उनकों बतायेंगे,
गर उनकी आखों में कहीं,
हम नजर आएंगे।
 
 प्रीती बङथ्वाल (तारिका)
                           चित्र-सोजन्य(गूगल)

Monday, June 29, 2009

दबे पांव आने दो बदरा...........





हे सूरज महाराज......
गर्मी को बरसाओ ना यूं ,
पत्थर सा सिकवाओ ना यूं ,
दबे पांव आने दो बदरा,
पानी-पानी को तरसाओ ना यूं ।


ना मुसकाते रहो यूं अकेले,
खङी धूप में, बिन सहेले,
तुमको होगी कसम चांदनी की,
दिन में तारे, दिखलाओ ना यूं ,
दबे पाव आने दो बदरा,
पानी-पानी को तरसाओ ना यूं ।



तुमभी अगन में तपे हो,
कई बरसों के प्यासे रहे हो,
थोङा रुकलो, तो आराम कर लो,
तुमभी खुद को सुखाया करो यूं ,
दबे पांव आने दो बदरा,
पानी-पानी को तरसाओ ना यूं ।
...............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Saturday, June 27, 2009

यूं सामना खुद का खुदी से हो गया.....

सोचा न था.....,
यूं जिन्दगी से धोखा हो गया,
यूं सामना,
जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।।
रब मिल गया था सोच कर,
खुश हो लिए,
आंखे खुली तो,
रब न जाने कहां खो गया,
यूं सामना,
जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।।
दिल दर्द के,
समन्दर में डूबा जा रहा,
आंखे भी छलक कर,
खाली हो रही,
भर रहे थे,
जो उङाने बादलों में,
टूट कर वो सपना,
सौ टुकङे हो रहा,
यूं सामना,
जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।।
पत्थरों से रगङती,
उस नाम को,
जो हरकदम मेरा,
हमराज़ था,
बन रहा वो आज,
मेरी आंखो में नमी,
कलतलक,
जो दिल के पास था,
यूं सामना,
जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।।
.............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Saturday, June 13, 2009

मेरा सागर........

"जिसके लिए इसबार की रचना लिखी है उसी के हाथों से बनी पेंटिंग इसबार पिक्चर में लगाई है आपको भी जरुर पसन्द आयेगी। उसने अपनी मन पसन्द चीज यानी कि कार को इस पिक्चर में बनाया है।"
प्यारी और मासूम है सूरत,
पर मन चंचल है,
सच्चे दिल का शहजादा है,
और नटखट है,
एक बात की बात बनाकर
वो रखता है,
अपनी बातों में उलझाकर
वो रखता है,
तुतलाता है बात-बात पर
गुस्साता है,
थोङा सा भी प्यार करो तो
खिल जाता है,
प्यार बहुत करता है मुझसे
वो जतलाता है,
बार-बार वो गले से मेरे लग
जाता है,
देख उसे मन की चिन्ताऐं
मिट जाती हैं,
अंधकार की सभी घटायें
छट जाती है।
...........
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

Wednesday, May 20, 2009

मासूम-सा दिल है ऐ "तारिका".......

कितनी बदल गई तस्वीरें,
क्या थी खुशियां क्या थे गम,
खुद को ही न पहचान सके,
जब टकराये खुद से ही हम।


जब-जब याद करें वो लम्हें,
आंखें भूल गई ज्योती,
टूटे माला के मनको-सी,
टपक रहे मन के मोती।



सपने रह-रह तङपाते हैं,
अफसाने....बस बन जाते हैं,
जैसे कोरे कागज में रखी हो,
अपनी कोरी बात कोई।



दीवारों मे चिन जाए यादें,
कोई तो ऐसा जतन करें,
मासूम-सा दिल है,
बहल जाएगा, ऐ “तारिका”
फिर कुछ मीठा सुन करके।
.............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका "
(चित्र - साभार गूगल)

Tuesday, April 14, 2009

मेरी कल्पनाएं और मेरे शब्द...

चांद को चांद न कहूं,
रजनी का चिराग कहूं,
तारों को तारे न कहूं,
निशा की बारात कहूं।



देख कर यूं पलटना,
ये लहरें नहीं,
सागर की अंगड़ाई हैं,
दर्द के भंवर ने जैसे,
कहीं गर्म हवा सहलाई है।


पक्षियों का चहकना भी,
हो जैसे मीठा राग कोई,
एक कतार में बैठे हो,
कई कलाकार कोई।



नदिया भी जैसे,
आईना हो कोई,
जिसपे संवर कर,
प्रकृति भी इतराती है
झूम कर आती है जब,
काली बदरा,
देखो कैसे,
शरमा के बरस जाती है।
............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Thursday, April 2, 2009

माता तेरे रुप हजार तू ही करती बेङा पार......





तू ही अम्बे तू जगदम्बे,
माता तेरे रुप हजार,
तू ही काली तू ही दुर्गे,
तू ही करती बेङा पार।


तेरे दर्शन के अभिलाषी,
आंखे दर्शन के बिन प्यासी,
प्यास बुझादे अबकी बार,
माता तेरे रुप हजार,
तू ही करती बेङा पार।


तुम हो वैष्णों पहाङा वाली,
मां, तुम सब भक्तों को प्यारी,
प्यार लुटादो तुम भी आज,
माता तेरे रुप हजार,
तू ही करती बेङा पार।


तुम ही वीणा की तारों में,
तुम ही राग और मल्हारों में,
तुम ही बनी, प्रकृति की आवाज,
माता तेरे रुप हजार,
तू ही करती बेङा पार।


सागर की लहरों में तुम हो,
ठण्डी पवन बहाती तुम हो,
सृष्टी रचना में, तुम हो सार,
माता तेरे रुप हजार,
तू ही करती बेङा पार।
.................
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र -साभार गूगल)

Monday, March 23, 2009

तुझको मैने याद किया है, और कुछ किया भी नहीं.......

मैंने हमेशा तुझे,
इस जिंदगी में खुश ही देखा,
या तेरी रहगुजर में,
दुःखों को तलाशा ही नहीं,
ये कहूं तो,
सच भी है और झूठ भी है,
तुझको मैने याद किया है,
और कुछ किया भी नहीं।


जब कभी शाम की तन्हाई में,
तू रहा भी हो,
मैने अपनी तन्हाई में,
तुझको पुकारा भी नहीं,
ये कहूं तो,
सच भी है और झूठ भी है,
तुझको मैने याद किया है,
और कुछ किया भी नहीं।

जाने क्यों?...अपने से ही,
छुपा रही हूं तुझको,
तू मेरे पास है,
और मैं इंकार कर रही हूं,
अपने यंकी को यंकी न होने दूं,
कि मैं तेरा इंतजार कर रही हूं।

सुन रहीं हैं, ये हवाएं और फिज़ा,
मेरा कहना,
और खुद मुझको,
इसका एहसास भी नहीं,
ये कहूं तो,
सच भी है और झूठ भी है,
तुझको मैने याद किया है,
और कुछ किया भी नहीं।
....
......
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Monday, March 16, 2009

कैसे जीवन को जीती वो?..........

जब कहते हैं, आजाद हैं हम,
तो नारी को, क्यों दिया बंधन,
लम्बें परदें की ओटों में,
क्यों बांध रहे उसको बंधन?



क्या सोचा है,..कभी तुमने,
कैसे जीवन को जीती वो?..
रस्मों की ओट में डाले हुए,
सारे बंधन को सहती वो?..




कहते हैं हया का परदा है,
क्या परदा नही, तो हया भी नहीं?..
बस एक घूंघट के घूंटों में,
क्यों तिल-तिल मार रहे उसको।
............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Wednesday, March 11, 2009

हर रंग लगे रसीला.......

रंग लगा हर चेहरा देखो,
लाल हरा, और पीला,
प्यार के रस में भरे हुए,
हर रंग लगे रसीला।
हर कोई राधा कृष्ण बना,
कोई धर्म का डोल बजे ना,
न कोई गोरा, न कोई काला,
बस एक ही रंग, सजे यंहा,
रंग लगा हर चेहरा देखो,
लाल हरा और पीला,
प्यार के रस में भरे हुए,
हर रंग लगे रसीला।

होली रंग में भीग रहें है,
बन के टोली-टोली,
हर बाला, लगे राधिका,
खेले कृष्ण की होली,
रंग लगा हर चेहरा देखो,
लाल हरा और पीला,
प्यार के रस में भरे हुए,
हर रंग लगे रसीला।


भूल के झगङा गले लगा अब,
न कोई बैर बनाना,
रंग में भर के, खेलो होली,
सब को गले लगाना,
रंग लगा हर चेहरा देखो,
लाल हरा और पीला,
प्यार के रस में भरे हुए,
हर रंग लगे रसीला।
..............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)
आप सभी को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

Saturday, March 7, 2009

तू इस तरहा से मेरी जिन्दगी में शामिल है।....

जैसे हवाओं में
महक का घुलना,
फूल में,
खुशबू का मिलना,
ख्वाब का,
पलकों में पलना,
रोशनी का,
दिये से जलना,
तू इस तरहा से,
मेरी जिन्दगी में शामिल है।


जैसे सीप में
मोती का मिलना,
बारिश में,
इन्द्रधनुष बनना,
होठों में,
हंसी का खिलना,
मंदिर में,
शंखनाद होना,
तू इस तरहा से,
मेरी जिन्दगी में शामिल है।
...........
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र - साभार गूगल)

Friday, March 6, 2009

मेरा हर शब्द है,...........


मेरा हर शब्द है,
मेरी ही किताब की तरहां,
रेखाओं में छिपे जज़बात,
उस गुलाब की तरहां,
जिसकी हर पंखुङी,
दर्द के कांटों से बनी,
जिसके आंसू हैं,
प्यालों में शराब की तरहां,
मेरा हर शब्द है,
मेरी ही किताब की तरहां।।

कहीं पर कुछ छूट गया,
और कहीं अफसाने हैं बने,
मासूम सूरत पे अभी तक,
गम के निशाने हैं बने,
उठता है हर ख्वाब जहां,
एक खु़मार की तरहां,
खुश्क पन्नों पे रहता है,
जो एक, किरदार की तरहां,
मेरा हर शब्द है,
मेरी ही किताब की तरहां।।

............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र - साभार गूगल)

Saturday, February 28, 2009

वो महकती-सी रोशनी...(एक खुशी के नाम)

निशा की चांदनी में,
वो दमकती-सी रोशनी,
रात की रानी से,
वो महकती-सी रोशनी,
कब मेरे दामन में,
उसकी, आहट-सी हुई,
जिसने मेरी रोशनी में भरी,
अपनी-सी रोशनी।।

तिनका-तिनका कर, बटोरती,
बरसों से चली थी,
आज जाकर, मेरे गुलिस्तां में खिली,
एक कली थी,
मेहमा है मेरे दिल में,
उसके आने की हर खुशी,
रात की रानी से,
वो महकती-सी रोशनी।।

शबनम के हर इशारे को,
समझ रही थी वो,
चंचल थी नज़र फिर भी,
एकटक खङी थी वो,
पूछती थी, कब से (मेरी) तकदीर की हुई,
खुशियों से दोस्ती,
रात की रानी से,
वो महकती-सी रोशनी।।
.............
प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र- साभार गूगल)

Wednesday, February 25, 2009

वो सच में..सब समझ रहा था।



वो खामोश नज़रों से मुझे,
अपलक निहारता,
और फिर, कुछ देर बाद,
नज़रे झुका कर चला जाता,
अपने को बहला कर,
फिर लौटता और मुझे,
फिर उसी हाल में देख कर,
सहम जाता।
ये सब देख रही थी मैं,
अपनी भीगी आंखों से,
मगर, चुप थी ये जानकर,कि
वो कहां समझ पा रहा होगा,
जो अभी सब हो रहा था,
हमारे आस-पास।
दिन के सांझ होने तक,
माहौल, कुछ काम में उलझा,
तभी, वो पास आकरके,
मुझसे बोला,
मम्मा बस, अब नही रोना हां....,
क्या ये वो ही है जिसे मेंने,
अभी नादा ही समझा था,
वो छोटा-सा, मेरा प्यारा,
ये सबकुछ समझता था।
वो सच में सब समझ रहा था।
..............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)



Tuesday, February 24, 2009

जब गया ‘वो’, मैं पुकारती रही…






ज़िन्दगी बनी ख़्वाब कभी,
ख़्वाब कभी ज़िन्दगी बनी,
जब कभी भी तलाश की,
मैं खुद को ढूढ़ती रही।

एक साया दिख के क्यों?
बार-बार ओझल हुआ,
मैं सोच में उलझी हुई, कि
‘वो’ कोई अपना-तो नहीं।

जीवन नहीं लंबा सफर,
ये जान कर भी, मोह में,
उङ गये पंछी को...बस,
मैं पुकारती रही...बस पुकारती रही।


............




(काफी दिन हो चले हैं कि लिखना एक दम छूट सा गया है। जब कोई अपना, बहुत अपना हमसे दूर बहुत दूर चला जाता है तो हर भाव चरम पर होते हैं। फिर से अब जिंदगी को राह पर तो चलना ही होगा और हमें उसके साथ। इसी कोशिश में तारिका।)

प्रीती बङथ्वाल ‘तारिका’
(चित्र-साभार गूगल)

Thursday, January 15, 2009

मेरी तन्हाइयों में...वो कौन था?



यादों के झरोखों से ज़रा,
झांकता, वो कौन था?
मेरी तन्हाइयों में भी वो,
एक पहचान था,वो कौन था?

मैं खुद बेखबर थी,
कि अन्जान थी उससे,
जो मेरे सवालों में, ये भी एक,
सवाल था, वो कौन था?

जिसने मेरे घरौंदे में अपनी,
आस को बसाया था,
कुछ नन्ही खुशियों को घर में,
सितारों सा सजाया था,

इतने करीब थी जिसके,
फिर भी ये दूरियां थी,
कहीं न कहीं कुछ तो,
ये भी मजबूरिया थी,

क्या मैं भी उन खुशियों को अपना,
आशियां बना पांऊगी,
कहीं छूते ही उन ख्वाबों को,
बिखर तो नहीं जाऊंगी,

सोचते ही सोचते, वो अहसास,
एक विश्वास बना, वो कौन था?
मेरी तन्हाइयों में भी वो,
एक पहचान था, वो कौन था?

.............

प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- सभार गूगल)

Sunday, December 14, 2008

फिर मूक बने हो तुम...

बाहर की गन्दी नजरों से,
घर अपना ही जला बैठे,
फिर, मूक बने हो तुम,
नज़रें अपनी ही झुका बैठे,

इक मां की ही,
पैदाइश होकर,
छीन रहे किसका दामन,
अपने चेहरे पर आतंकी का,
क्यों ये चेहरा लगा बैठे,

बात नहीं किसी धर्म की है,
न ही रंग का भेद यहां,
ये बात है उस मां की,
और उस मिट्टी की,
जिसका दामन तुम,
खुद अपने हाथों जला बैठे।।
............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

Tuesday, December 2, 2008

कितना भी आंसुओं को रोक लें.......

जिन्दगी अब मुझे,
यूं भाती नहीं,
कितना भी आंसुओं को रोक लें,
हंसी आती नहीं,
हर मोङ पर सिर्फ,
दर्द और तन्हाईयां हैं,
जिधर भी नज़र डाले,
तङपती परछाइयां हैं,
वो भी (परछाइयां) मुझे देखकर,
मुझसे ही दूर जाती रहीं,
कितना भी आंसुओं को रोक लें,
हंसी आती नहीं,
जिन्दगी अब मुझे,
यूं भाती नहीं।
...........
प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र-साभार गूगल)

Friday, November 21, 2008

क्यों तुम मुझसे रुठे हो।





पापा....क्यों मुझसे रुठे हो,
क्या...मैं नहीं हूं तुम्हारी,
मां.....क्यों ना मुझसे बोल रही,
जब मिली तुमसे ही सांस हमारी।।


क्यों ना अपनाते मुझको,
क्यों ना होती परवाह मेरी,
क्यों ना तुम भैया के जैसे,
मुझको भी लोरी सुनाती हो।।

दो जवाब, इन कलियों को,
क्यों न खिलने देते तुम,
मन में लिए प्रश्न कई,
पूछ रहा अधखिला “वो” फूल।।
..........

प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Wednesday, November 19, 2008

बाकि...गंगा मैया पर छोङ दो।



पाप करो तुम, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो,
खाओ पियो तुम, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो।।
ऐश करो तुम, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो,
गंद करो तुम, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो।।
शहर का कचरा लाकर,
गंगा मैया पर छोङ दो,
फूंक दो मुझको, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो,
हर-हर गंगे बोल, बाकि,
गंगा मैया पर छोङ दो।।

...............


प्रीती बङथ्वाल ‘तारिका’
(चित्र-साभार गूगल)