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Wednesday, February 25, 2009

वो सच में..सब समझ रहा था।



वो खामोश नज़रों से मुझे,
अपलक निहारता,
और फिर, कुछ देर बाद,
नज़रे झुका कर चला जाता,
अपने को बहला कर,
फिर लौटता और मुझे,
फिर उसी हाल में देख कर,
सहम जाता।
ये सब देख रही थी मैं,
अपनी भीगी आंखों से,
मगर, चुप थी ये जानकर,कि
वो कहां समझ पा रहा होगा,
जो अभी सब हो रहा था,
हमारे आस-पास।
दिन के सांझ होने तक,
माहौल, कुछ काम में उलझा,
तभी, वो पास आकरके,
मुझसे बोला,
मम्मा बस, अब नही रोना हां....,
क्या ये वो ही है जिसे मेंने,
अभी नादा ही समझा था,
वो छोटा-सा, मेरा प्यारा,
ये सबकुछ समझता था।
वो सच में सब समझ रहा था।
..............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)