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Saturday, June 13, 2009

मेरा सागर........

"जिसके लिए इसबार की रचना लिखी है उसी के हाथों से बनी पेंटिंग इसबार पिक्चर में लगाई है आपको भी जरुर पसन्द आयेगी। उसने अपनी मन पसन्द चीज यानी कि कार को इस पिक्चर में बनाया है।"
प्यारी और मासूम है सूरत,
पर मन चंचल है,
सच्चे दिल का शहजादा है,
और नटखट है,
एक बात की बात बनाकर
वो रखता है,
अपनी बातों में उलझाकर
वो रखता है,
तुतलाता है बात-बात पर
गुस्साता है,
थोङा सा भी प्यार करो तो
खिल जाता है,
प्यार बहुत करता है मुझसे
वो जतलाता है,
बार-बार वो गले से मेरे लग
जाता है,
देख उसे मन की चिन्ताऐं
मिट जाती हैं,
अंधकार की सभी घटायें
छट जाती है।
...........
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

Tuesday, May 12, 2009

मैं लहर हूं, सागर में खो जाती हूं............

सच कहना
क्या तुम भी मेरा,
दर्द समझते हो?
पत्थर से टकराना,
फिर बहजाना,
क्या अर्थ समझते हो?
न मिल पाना अपनों से,
घुट कर रह जाना,
जीवन है संघर्ष मेरा,
न कुछ पाना,
बस खोते जाना,
क्या ये सच, समझते हो?


मैं रोऊं भी तो,
क्यों कर,
न इसका एहसास तुम्हे होगा।
तुम समझ के बैठे हो,
मै इठलाती हूं,
पर न जान सके,
मैं पास जो आना चाहूं,
तो भी टकराके बहजाती हूं।
मैं लहर हूं ,
सागर में खो जाती हूं।
..............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Monday, November 17, 2008

कोई पूछे अगर...मैं कौन हूं....


कोई पूछे अगर, तो क्या जवाब दूं,
कि मैं कौन हूं ,और कंहा हूं मैं ?

मैं नदी हूं, जो है बह रही,
लिए संग अपने, कई सफर,
चली जा रही, बस तलाश है,
कहीं पर मिले, उसे सागर लहर।

मैं ख्वाब हूं, जो बुना आस ने,
लिए हर ख्वाहिश को, पास में,
चंद लम्हें, और बस,
छू लूं मैं, सारे हाथ से।
मैं परिंदा हूं, जिसे उङने की आरज़ू,
गिर-गिर के, संभलना सीखती,
पंख फङफङा लूं, बस अगर,
पहुंचूं गगन के, छोर तक।

मैं शब्द हूं, जो अभी निशब्द है,
रंगो का है, उसे इंतज़ार,
फूलों की बारिश हो, बस अगर,
बन जाऊं, मोतियों सी लङी।
....................
प्रीती बङथ्वाल ‘तारिका’
(चित्र-साभार गूगल)

Sunday, September 14, 2008

मैं तो, सिर्फ काग़ज हूं

इतना मत रुलाओ कि,
मुश्किल हो हंस पाना,
मैं तो, सिर्फ काग़ज हूं,
मुझे आंसुओं के सागर में,
मत डुबाना।

मुझपे जो लिखी थी,
कभी कहानी तुम ने,
तुमसे गुज़ारिश है,
उसे फिर न दोहराना,
इतना मत रुलाओ कि,
मुश्किल हो हंस पाना।

खा़मोश पलकें थी,
दर्द की तन्हाईयों में,
कोई ख्वाब टूटा था शायद,
इन आईनों में,
ख्वाब में आके जरा तुम,
तन्हाईयों को सहलाना,
इतना मत रुलाओ कि,
मुश्किल हो हंस पाना।
..............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(फोटो-सभार गुगल )

Sunday, July 13, 2008

कुछ पन्ने मेरी किताब के......

भाग ३- ‘अपनों की कशिश’

“ दिल उजले पाक फूलों से, भर दिया था किसने,
उस दिन, हमारी आखों से अश्क बह रहे थे ”।

दरवाजे की घण्टी ने अचानक मुझे अपने ही तसव्वुर से जगाया। होश में आते ही लगा क्या ये ख्वाब है, नहीं..... मैं दरवाजे की और भागी। दरवाजा खोला तो हक़ीकत का अंदाजा हो गया। सब दरवाजे पर थे, अरे....ये सपना नही, सच है । ये शब्द मन ही मन, मैं बार-बार अपने आप से कहे जा रही हूं। काफी दिनों के बाद सबसे मिलना हुआ और मिलते ही दिल बाग-बाग हो गया, मेरे लिए मेरा घर जन्नत हो गया। समझ नही आ रहा है कि वो मेरी खुशी में शामिल हैं या मैं अपनी खुशी को उनके साथ देख रही हूं।
आज वो दिन है जब पहली बार मेरे चांद का अपने ननिहाल से स्पर्श हुआ। मेरा बेटा अपने ननिहाल की गोद में खेल रहा है। एक-एक कर सबने उसे अपनी गोद में लेकर खिलाया। ये सब देखकर मन बहुत खुश हो रहा है।
अब वक्त हो गया, फिर से अपनों से जुदा होने का। दिल में फिर एक टीस उठी जो उन्हें जाते हुए देख आखों से बह निकली। मेरे अपने फिर से दूर जाते हुए मेरी आखों से ओझल हो गये। आज रात आखों में नींद का आना तो जैसे वर्जित है। सारी रात आंखों में पूरे दिन की कहानी चलती रही।
अब अपने से ज्यादा अपने बेटे के बारे में सोचती हूं। उसे भी अपने हिस्से की सारी खुशियां पाने का हक़ है। यही सोच कर मेने अपने हमसफर को अपनी एक खव्वाहिश के बारे में बताया जिसे सुन वो राजी भी हो गए। मेरी हालत को समझते हुए वो मान गए। हमने, नाना-नानी से नाती को मिलाने का प्लान बनाया, शायद उसे देख कर ही उनका मन कुछ स्थिर हो। सिर्फ नाना-नानी ही तो रह गए हैं जिन्होंने मेरी आंख के तारे को अभी तक नहीं देखा है। सिर्फ वो ही तो नाती से मिलने नही आए हैं। हमने सोचा हम ही अपने ढाई महिने के बेटे को लेकर उनसे मिलने चले जाए। लेकिन मन काफी कशमकश में था और काफी सवालों से घिर गया था। वो हमें आने देंगे या नहीं, हमसे मिलेगें भी या.....? ऐसे ही कई सवाल हर समय जहन में घूम रहे है और दिल-दिमाग को परेशान कर रहे हैं।

“कुछ हसरतें पूरी हुई, कुछ हसरतों के बाद,
कुछ का होना अभी बाकी है, मैं इंतजार में हूं......”


प्रीती बड़थ्वाल

Wednesday, July 9, 2008

कुछ पन्ने मेरी किताब के...

भाग २-इंतजार अपनों का



कहानी को आगे बढ़ाते हुए....

‘सितम को नत मस्तक जालिम को रुसवा हम भी देखेंगे,
चल-ऐ-अज्में बगावत चल, तमाशा हम भी देखेंगे’।

साल का पहला दिन ही मेरे लिए खुशियों की सौगात लेकर आया। मुझे खुद के लिए कम अपने बेटे के लिए ज्यादा खुशी हो रही है। हमारे घर पर, मेरे घर से पहली बार मेरे कुछ करीबी रिश्तेदार मिलने आ रहे हैं। मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। साल के पहले ही दिन मेरे अपने, मुझसे और मेरे बेटे से मिलने आएं चाहे वो थोड़े समय के लिए ही आएं महज़ एक या दो घंटे के लिए। लगता है ये साल मेरे जीवन में फिर से खुशियां ही खुशियां भर देगा। उनके आने का संदेशा मिल गया था सो मेने सुबह ही खीर बना ली। अब बाकी था तो सिर्फ और सिर्फ इंतजार। मेरे अपनों का इंतजार, मेरे अपने के लिए। जल्दी-जल्दी घर का सारा काम खत्म किया और फिर मैं बॉलकनी में खङे हो कर उनकी राह तकने लगी। एक-एक पल घंटे की तरह लग रहा था। जब भी अपनों को आने में देर होती है तो मन शंकाओं से घिर जाता है । कभी भी सही बात ध्यान नहीं आती। आते हैं तो सिर्फ गलत ही विचार ध्यान में। पहली बार आ रहे हैं पता नहीं रास्ता मिला या नहीं। घर का पता तो सही ही लिखा है ना। कहीं प्लान तो चेंज नहीं हो गया। प्लान चेंज होता तो कोई ना कोई फोन जरूर करता। कहीं मुझे बुरा लगेगा इसलिए फोन ही नहीं कर रहे हों। जहां तक नजर जा सकती थी देखती रही। अंजान की वो लाइनें याद आ रही हैं ‘इंतहां हो गई इंतजार की….’।
अब तो आस भी आंखों का साथ छोड़ने लगी थी। तभी, दूर से दो रिक्शे आते दिखाई दिए। फिर से आंख ने आस का दामन थाम लिया। सवाल सिर्फ ये कि दो-तीन घंटे का इंतजार रंग लाएगा। क्या सच ये वो ही हैं जिनका सुबह से मुझे इंतजार है। क्या ये जो आ रहे हैं मेरे अपने हैं। हां...हां...ये तो वो ही हैं। जिनका इंतजार मुझे कब से था। मेरी आंखें छलछला गई। मैं रोती जारही थी। मेरी आंखें उस धुंधले में भी उनको देखने के लिए तरसने लगी। दिल और दिमाग का संगम तो देखिए मैं रोना भी चाह रही हूं और उन्हें देखना भी। पहली बार आए इस एहसास ने मुझे रोमांचित कर दिया। कभी मैं उन्हें देख हाथ हिलाती तो कभी उसी हाथ से आंखों से निकलते धारा-प्रवाह को पोंछती। रिक्शा मेरे पास आता जा रहा था, मेरे घर का फासला महज कुछ मीटर ही रह गया, तब मैं अपने बेटे को गोदी में लेकर
आई और बोली, ‘देख तो कौन आ रहे हैं, बेटु तेरे अपने तुझे देखने आरहे हैं। मुझे तलाशती उनकीं नजरें इधर-उधर देख रहीं थीं और मैं चौथे फ्लोर अपने बेटे के साथ दोनों हाथों से खुशियां बटोर रही थी। आज मेरे अपने, मेरे पास हैं।
“मेरी आंखों में है इक अब्र का टुकड़ा शायद,
कोई मौसम हो सरेशाम बरस जाता है,
दे तसल्ली जो कोई, आंख छलक उठती है,
कोई समझाए तो दिल..और भी भर आता है।”

जारी है...


प्रीती बड़थ्वाल

Monday, July 7, 2008

कुछ पन्ने मेरी किताब के...

जिन्दगी में बहुत से पल हैं जिन्हें भूलना चाहो भी तो नहीं भूल सकते और कुछ ऐसे जो याद भी नहीं। लिखने को बहुत है लेकिन शुरूवात कहां से करूं समझ नहीं आ रहा। नये सफर से ही शुरू किया जाये ये अपना सफरनामा। बात तबकी जब मेने अपना कदम अपने घर की दहलीज से बाहर निकालकर अपने हमसफर के साथ मिला लिया। वो जो दिलों दिमाग में छाया हुआ था जिसके अलावा ओर कुछ दिखता ही नहीं था। मेरे कोरे कागज में उसका नाम कब शामिल हुआ पता ही नही चला। लेकिन आज हम साथ है ये सबसे बङा सच है। वो समय ऐसा था जो रह-रहकर घर की याद दिलाता और आखों में गंगा-जमुना बहती रहती थी। ऐसे में अगर मेरा साथ दिया तो वो था ‘मेरा हमसफर’ । हमारा साथ होना कोई आसान बात नहीं थी। एक लम्बे अंतराल के बाद हम साथ थे इस बात की खुशी थी। लेकिन घर छूटने का गम भी छोटा नहीं था। घर की याद, हर दिन सुबह ऑखों में आंसू लिए शुरू होती और शाम आंसू लिए खत्म होती। और ‘वो’ मेरा दिल बहलाने के लिए मुझे हसांने के लिए जी तोङ कोशिश करते, और जबकभी कामयाब नहीं हो पाते तो खुद भी रोने लग जाते। हमारी शाम अक्सर अपने घर की छोटी-सी बालकॉनी में चाय की चुस्कीयों के साथ गुजरती।
फिर कुछ समय बाद एक घटना घटी। हम एक दोस्त की शादी से लौट रहे थे कि उस बस की जोरदार टक्कर हो गई। थोङी बहुत चोटें आई लेकिन हम सही सलामत बच गये। तब से बससे जाते हुए डर सा लगता है।
कुछ समय और बीता तो खबर मिली कि हमारी बहन का रिस्ता पक्का हो गया है लेकिन हमारा बुलावा निषेद था। मुझे अंदेशा था लेकिन आशा बिलकुल नही थी। बहुत बुरा लगा था मुझे।
चलो फिर भी ये लगा बुलाया न सही पर शायद कोई रिश्तेदार तो हमसे मिलने जरूर आयेगा। क्योंकि मिलने का बहाना भी था मेरा बेटा जो हुआ था। इसी कारण हम ससुराल से भी सबके मना करने के बावजूद उन्हें नाराज करके और बहुत कुछ सुनने के बाद भी अपने बेटे को लेकर अपने घर लौट आये थे। लेकिन हमसे मिलने कोई नहीं आया। सबने अपनी-अपनी मजबूरी बता दी। क्या मेरी जगह कोई ओर होता तो उससे मिलने भी न आते?
चलो ये दर्द भी दिल में दबा दिया। मालूम था मुझे कि अभी तो शुरूवात थी ये। बहन की शादी के एक महिने बाद ही पापा रिटायर हो गये। घर पर पाठ रखा गया लेकिन वहां भी हमें नहीं बुलाया गया। मैं बहुत रोयी। ये किसी को समझाना बहुत मुसकिल है कि कैसा लगता है जब अपने ही तुम्हें न पूछे।

जारी है........


प्रीती बड़थ्वाल