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Tuesday, May 12, 2009

मैं लहर हूं, सागर में खो जाती हूं............

सच कहना
क्या तुम भी मेरा,
दर्द समझते हो?
पत्थर से टकराना,
फिर बहजाना,
क्या अर्थ समझते हो?
न मिल पाना अपनों से,
घुट कर रह जाना,
जीवन है संघर्ष मेरा,
न कुछ पाना,
बस खोते जाना,
क्या ये सच, समझते हो?


मैं रोऊं भी तो,
क्यों कर,
न इसका एहसास तुम्हे होगा।
तुम समझ के बैठे हो,
मै इठलाती हूं,
पर न जान सके,
मैं पास जो आना चाहूं,
तो भी टकराके बहजाती हूं।
मैं लहर हूं ,
सागर में खो जाती हूं।
..............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)