
कोई पूछे अगर, तो क्या जवाब दूं,
कि मैं कौन हूं ,और कंहा हूं मैं ?
मैं नदी हूं, जो है बह रही,
लिए संग अपने, कई सफर,
चली जा रही, बस तलाश है,
कहीं पर मिले, उसे सागर लहर।
मैं ख्वाब हूं, जो बुना आस ने,
लिए हर ख्वाहिश को, पास में,
चंद लम्हें, और बस,
छू लूं मैं, सारे हाथ से।
मैं परिंदा हूं, जिसे उङने की आरज़ू,
गिर-गिर के, संभलना सीखती,
पंख फङफङा लूं, बस अगर,
पहुंचूं गगन के, छोर तक।
मैं शब्द हूं, जो अभी निशब्द है,
रंगो का है, उसे इंतज़ार,
फूलों की बारिश हो, बस अगर,
बन जाऊं, मोतियों सी लङी।
....................
कि मैं कौन हूं ,और कंहा हूं मैं ?
मैं नदी हूं, जो है बह रही,
लिए संग अपने, कई सफर,
चली जा रही, बस तलाश है,
कहीं पर मिले, उसे सागर लहर।
मैं ख्वाब हूं, जो बुना आस ने,
लिए हर ख्वाहिश को, पास में,
चंद लम्हें, और बस,
छू लूं मैं, सारे हाथ से।
मैं परिंदा हूं, जिसे उङने की आरज़ू,
गिर-गिर के, संभलना सीखती,
पंख फङफङा लूं, बस अगर,
पहुंचूं गगन के, छोर तक।
मैं शब्द हूं, जो अभी निशब्द है,
रंगो का है, उसे इंतज़ार,
फूलों की बारिश हो, बस अगर,
बन जाऊं, मोतियों सी लङी।
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प्रीती बङथ्वाल ‘तारिका’
(चित्र-साभार गूगल)
