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Monday, September 21, 2009

मां पार लगा दे नैया....




शुभ नवरात्रि

मां तेरे रंग में रंग जांएगे,
मां तेरे ही हम गुण गाएंगे,
हम बच्चें तेरे हैं, तू है मैया,
मां पार लगा दे नैया, मां पार लगा दे नैया।




तू दर आये की सुनती,
तू हर खुशियों को बुनती,
मेरी  इक आस है मैया,
मेरे घर भी आये मैया,
मां पार लगा दे नैया, मां पार लगा दे नैया।





इस जगत में भटक रहें हैं,
किस बात को तरस रहें हैं,
ये समझ में आये कहीं ना,
तू अब राह दिखादे मैया,
मां पार लगा दे नैया, मां पार लगा दे नैया।




भक्तों की आस तुम्हीं हो,
भक्तों की आवाज़ तुम्हीं हो,
भगती को ऐसे, ठुकराओ नहीं मां,
हमें गले लगा ले मैया,
मां पार लगा दे नैया, मां पार लगा दे नैया।

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प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र – साभार गूगल)

Sunday, May 10, 2009

दिल ढूंढता है फिर वही...........

दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।
जिसकी छाया में
सारे दिन की थकान,
छूमंतर हो जाती।
जिसके हाथों की गरमाहट,
माथे को सहलाती,
अपने होने का
एहसास कराती,
और हर मुश्किल
आसान हो जाती।
दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।

कुछ कहने से पहले ही,
सब कुछ समझ जाती,
मन की इच्छाओं को,
भांप जाती,
गलती होने पर,
कभी डांटकर तो कभी, प्यार से समझाती,
दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।
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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)


Sunday, December 14, 2008

फिर मूक बने हो तुम...

बाहर की गन्दी नजरों से,
घर अपना ही जला बैठे,
फिर, मूक बने हो तुम,
नज़रें अपनी ही झुका बैठे,

इक मां की ही,
पैदाइश होकर,
छीन रहे किसका दामन,
अपने चेहरे पर आतंकी का,
क्यों ये चेहरा लगा बैठे,

बात नहीं किसी धर्म की है,
न ही रंग का भेद यहां,
ये बात है उस मां की,
और उस मिट्टी की,
जिसका दामन तुम,
खुद अपने हाथों जला बैठे।।
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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"