ज़िन्दगी बनी ख़्वाब कभी,
ख़्वाब कभी ज़िन्दगी बनी,
जब कभी भी तलाश की,
मैं खुद को ढूढ़ती रही।
एक साया दिख के क्यों?
बार-बार ओझल हुआ,
मैं सोच में उलझी हुई, कि
‘वो’ कोई अपना-तो नहीं।
जीवन नहीं लंबा सफर,
ये जान कर भी, मोह में,
उङ गये पंछी को...बस,
मैं पुकारती रही...बस पुकारती रही।
ख़्वाब कभी ज़िन्दगी बनी,
जब कभी भी तलाश की,
मैं खुद को ढूढ़ती रही।
एक साया दिख के क्यों?
बार-बार ओझल हुआ,
मैं सोच में उलझी हुई, कि
‘वो’ कोई अपना-तो नहीं।
जीवन नहीं लंबा सफर,
ये जान कर भी, मोह में,
उङ गये पंछी को...बस,
मैं पुकारती रही...बस पुकारती रही।
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(काफी दिन हो चले हैं कि लिखना एक दम छूट सा गया है। जब कोई अपना, बहुत अपना हमसे दूर बहुत दूर चला जाता है तो हर भाव चरम पर होते हैं। फिर से अब जिंदगी को राह पर तो चलना ही होगा और हमें उसके साथ। इसी कोशिश में तारिका।)
प्रीती बङथ्वाल ‘तारिका’
प्रीती बङथ्वाल ‘तारिका’
(चित्र-साभार गूगल)
