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Tuesday, May 5, 2009

मैं प्यार का समन्दर..........



अहसास में, डुबो कर,
प्यार की, कलम से,
लिख दिए, जज़्बात,
जो खिल रहे, कमल से।



मैं डोर से बंधी हूं,
तेरे प्यार का है बंधन,
तुम डूब जाओ मुझमें,
मैं प्यार का समन्दर।



मैं मोम-सी पिघल कर,
तेरी सांसों में बसूंगी,
तुम जबभी पलके मूंदों,
बस मैं ही मैं दिखूंगी।



दिल कह रहा है तुमसे,
बस याद मुझको आना,
वर्ना यूं अनबन होगी,
मेरी नजर की, तेरी नजर से।

............

प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

(चित्र- साभार गूगल)

Monday, March 16, 2009

कैसे जीवन को जीती वो?..........

जब कहते हैं, आजाद हैं हम,
तो नारी को, क्यों दिया बंधन,
लम्बें परदें की ओटों में,
क्यों बांध रहे उसको बंधन?



क्या सोचा है,..कभी तुमने,
कैसे जीवन को जीती वो?..
रस्मों की ओट में डाले हुए,
सारे बंधन को सहती वो?..




कहते हैं हया का परदा है,
क्या परदा नही, तो हया भी नहीं?..
बस एक घूंघट के घूंटों में,
क्यों तिल-तिल मार रहे उसको।
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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)