Sunday, November 2, 2008

ख्वाब और जिन्दगी


ख्वाब और जिन्दगी दोनों,
साथ हैं मगर,
रास्ते दोनों के,
जुदा हो गये,
एक बन्द आंखों के तले,
हंसते थे,
दूसरे खुली पलकों पे,
फिदा हो गये,
फिर भी रास्ते दोनों के,
क्यों जुदा हो गये।
.............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र-सभार गुगल )

25 comments:

  1. ख्वाब और जिन्दगी दोनों,
    साथ हैं मगर,
    रास्ते दोनों के,
    जुदा हो गये,
    kitna khoobsurat likha hai

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  2. बहुत कमाल की रचना...लाजवाब भावः...आप के ब्लॉग पर आना हमेशा अच्छा लगता है....जल महल का चित्र घर की याद दिलाता है...
    नीरज

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  3. फिर भी रास्ते दोनों के,
    क्यों जुदा हो गये।


    बड़ा दार्शनिक सवाल है ! जहाँ एक खत्म होता है , दूसरा वहाँ से शुरू होता है !
    बहुत सुंदर रचना ! बधाई !

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  4. अहसास का समंदर है आपकी रचना...
    बेहतरीन..
    बधाई.

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  5. कुछ सवालों के जवाब नहीं होते!

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  6. एक बन्द आंखों के तले,
    हंसते थे,
    दूसरे खुली पलकों पे,
    फिदा हो गये,

    कमल की बात कही है आपने बहोत सुंदर भाव ...

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  7. कच्‍चे धागों के रिश्‍तों को साफगोई के साथ बयां किया है आपने। सवाल है लेकिन जबाव भी इसी के इर्द-गिर्द है।

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  8. एक छोटी सी कविता, लेकिन हक्कीकत के कितने पास.बहुत सुन्दर.
    धन्यवाद

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  9. गागर में सागर भर दिया है आपने...

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  10. वाह!! बहुत खूब!!


    रास्ते बस जुदा हैं-मंजिल एक ही है. :)

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  11. bahut khoob, sundar rachna hai
    pushp

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  12. achchha lagaa aapki rachna padhke,
    chhoti lekin mahatvpoorn
    aapka
    vijay tiwari kislay

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  13. वाह वाह तारिका जी (अब हम प्रीतीजी नहीं कहेंगे) बहुत खूब रचना बन पड़ी है. क्या कहना !
    मगर यदि और असरदार करना हो और आप बुरा न माने तो इसे इस तरह कह कर देखिये ज़रा ---

    ख़्वाब और हक़ीक़त हैं दोस्त मगर, रास्ते दोनों के जुदा हो गऐ.
    ये मुंदी पलकों के तले हँसते थे, वो खुली पलकों पे फ़िदा हो गऐ.
    "तारिका" इस बात पे हैरान है के, क्यूँ ये दोनों यूँ अलहदा हो गऐ.

    अच्छा लगा के नहीं ? बतलाइएगा ! यदि हाँ, तो बिना झिझक पोस्ट पर फिर चढ़ाइएगा.

    ---आपका बवाल

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  14. वाह बहुत खूब। कम शब्दों में बहुत कुछ कह देती है आप।
    ख्वाब और जिन्दगी दोनों,
    साथ हैं मगर,
    रास्ते दोनों के,
    जुदा हो गये,

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  15. इनके रास्ते क्यों जुदा हो गए,सही प्रशन हैं पर उत्तर कहाँ हैं ?बहुत ही सुंदर रचना .

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  16. आपने बहूत सुंदर लिखा है धन्यवाद जो आपने मेरा ब्लॉग पड़ा आप मेरा समय बदल रह है जरूर पढिये गा और अपनी राय दिजेयगा

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  17. रास्ते जुदा हुए इसलिए...
    क्योंकि ज़िन्दगी ख्वाब है, ख्वाब है ज़िन्दगी...
    एक की मंजिल है मौत और दूसरे को टूटना है

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  18. एक बन्द आंखों के तले,
    हंसते थे,
    दूसरे खुली पलकों पे,
    फिदा हो गये,
    अत्यन्त दिल को छूने वाली रचना

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  19. milna-bichhudna,roshani-andhera,din-rat, sukh- dukh, yog-viyog. zindgi ko khubsurat banae ke alag alag nam hai. kalyan ho balike
    narayan narayan

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  20. ख्वाब और जिन्दगी दोनों,
    साथ हैं मगर,
    रास्ते दोनों के,
    जुदा हो गये,
    एक बन्द आंखों के तले,
    हंसते थे,
    दूसरे खुली पलकों पे,
    फिदा हो गये,
    फिर भी रास्ते दोनों के,
    क्यों जुदा हो गये।

    Bahut achcha likha hai.Badhai.

    guptasandhya.blogspot.com

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  21. zindagi ek khwaab hai ya kwaab hai ye zindagi...
    sawalon pe sawal hain kya sirf sawal hai ye zindagi....
    bahut hi sundar likha hai..
    ek anjana sa dost akshay-mann

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  22. हा..हा...हा..हा...मगर ख्वाब और जिन्दगी एक साथ कहाँ हैं......ख़्वाबों को कहीं और जाना होता है...और जिन्दगी तो खैर.....मगर विचार भी खुबसूरत से ख़्वाबों की तरह आते हैं....और प्यारा सा कोई पैगाम देकर चले जाते हैं....जिन्दगी चलती रहती है.....और ख्वाब ...भटकते.....हा..हा...हा..हा.....बुरा ना माने...होली नहीं है......

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