Monday, November 17, 2008

कोई पूछे अगर...मैं कौन हूं....


कोई पूछे अगर, तो क्या जवाब दूं,
कि मैं कौन हूं ,और कंहा हूं मैं ?

मैं नदी हूं, जो है बह रही,
लिए संग अपने, कई सफर,
चली जा रही, बस तलाश है,
कहीं पर मिले, उसे सागर लहर।

मैं ख्वाब हूं, जो बुना आस ने,
लिए हर ख्वाहिश को, पास में,
चंद लम्हें, और बस,
छू लूं मैं, सारे हाथ से।
मैं परिंदा हूं, जिसे उङने की आरज़ू,
गिर-गिर के, संभलना सीखती,
पंख फङफङा लूं, बस अगर,
पहुंचूं गगन के, छोर तक।

मैं शब्द हूं, जो अभी निशब्द है,
रंगो का है, उसे इंतज़ार,
फूलों की बारिश हो, बस अगर,
बन जाऊं, मोतियों सी लङी।
....................
प्रीती बङथ्वाल ‘तारिका’
(चित्र-साभार गूगल)

18 comments:

  1. मैं शब्द हूं, जो अभी निशब्द है,
    रंगो का है, उसे इंतज़ार,


    सुन्दरतम एहसास ! लाजवाब रचना ! शुभकामनाएं !

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  2. BHAHUT KHUB BHAHUT KHUB
    "MAIN KHWAB HU JO BUNA AAS NE"
    BHAUT HI ACCHA LAGA

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  3. मैं शब्द हूं, जो अभी निशब्द है,
    रंगो का है, उसे इंतज़ार,
    फूलों की बारिश हो, बस अगर,
    बन जाऊं, मोतियों सी लङी।
    bahut sunder likha aapne
    regards

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  4. Ajneya jee ne kaha tha
    " jo mam hai wahee mametar bhee hai"
    Bahut sundar rachna. ek vyaktigat ehsas jo har kisee ko apna ehsas lagta hai. kavita se aur kya umeed kee ja saktee.
    subhkaamna
    ranjit

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  5. खूबसूरत प्रवाह लिए हुए है आपकी रचना

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  6. मैं नदी हूं, जो है बह रही,
    लिए संग अपने, कई सफर,
    चली जा रही, बस तलाश है,
    कहीं पर मिले, उसे सागर लहर।

    bahot hi sundar lahaje me likhi behatarin poem... aapko dhero badhai ......

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  7. poori rachna bahut hi pyari hai.......
    bahut hi satik kalpna aur sundar ehesaas piroye hue hai.....
    bahut khub....

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  8. बहुत बढ़िया है ....

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  9. ब्‍लॉग का शीर्षक 'मेरा सागर' का आज आपकी कवि‍ता में वि‍स्‍तार है। बहुत सुंदर।

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  10. एक बहुत ही गहरी सोच लिये है आप की कविता
    धन्यवाद

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  11. परिंदा हूं, जिसे उङने की आरज़ू,
    गिर-गिर के, संभलना सीखती,
    पंख फङफङा लूं, बस अगर,
    पहुंचूं गगन के, छोर तक।
    बहुत सुंदर रचना है आप की प्रीती जी...वाह...आप के ब्लॉग पर आना घर आने जैसा लगता है...जल महल की छवि घर और बचपन की यादें तजा कर देती है...
    नीरज

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  12. मैं शब्द हूं, जो अभी निशब्द है,
    रंगो का है, उसे इंतज़ार,
    फूलों की बारिश हो, बस अगर,
    बन जाऊं, मोतियों सी लङी।

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  13. पिछली सभी कविताओं की तरह सुन्दर कविता!

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  14. shabd jab nihshabd hote hain
    to satya utarta hai
    prashno ke gahwar se aatma bolti hai
    bahut sundar

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  15. अच्छा लिखा है आपने । िवषय की अभिव्यक्ित प्रखर है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख महिलाओं के सपने की सच्चाई बयान करती तस्वीर लिखा है । समय हो तो उसे पढें और राय भी दें-

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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