Tuesday, May 12, 2009

मैं लहर हूं, सागर में खो जाती हूं............

सच कहना
क्या तुम भी मेरा,
दर्द समझते हो?
पत्थर से टकराना,
फिर बहजाना,
क्या अर्थ समझते हो?
न मिल पाना अपनों से,
घुट कर रह जाना,
जीवन है संघर्ष मेरा,
न कुछ पाना,
बस खोते जाना,
क्या ये सच, समझते हो?


मैं रोऊं भी तो,
क्यों कर,
न इसका एहसास तुम्हे होगा।
तुम समझ के बैठे हो,
मै इठलाती हूं,
पर न जान सके,
मैं पास जो आना चाहूं,
तो भी टकराके बहजाती हूं।
मैं लहर हूं ,
सागर में खो जाती हूं।
..............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

13 comments:

  1. मैं पास जो आना चाहूं,
    तो भी टकराके बहजाती हूं।
    मैं लहर हूं ,
    सागर में खो जाती हूं।

    --गहरी बात कही...बधाई.

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  2. मैं रोऊं भी तो,
    क्यों कर,
    न इसका एहसास तुम्हे होगा।

    लहर की वेदना का बहुत सही संप्रेषण.

    रामराम.

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  3. ये कविता मेरे दोस्त के अभी चल रहे जीवन पर काफी फिट बैठती है ....सच ही कहा है आपने ...बहुत अच्छी लगी

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  4. बहुत सुंदर मैम...लहरों की पीड़ा को शब्दों में बाँध कर एक अच्छी कविता से मिलवाने का शुक्रिया...

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  5. सुन्दर रचना की प्रस्तुति के लिये आभार ।

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  6. wah sunder lehron kemann ki baat keh di ho jaise.

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  7. बहुत बढ़िया ....अच्छी लगी आपकी रचना...

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  8. मैं पास जो आना चाहूं,
    तो भी टकराके बहजाती हूं।
    मैं लहर हूं ,
    सागर में खो जाती हूं।
    ..............
    ये बहतरीन रचना कहा छिपा कर रखी थी...
    बहुत अच्छी लगी...
    सुंदर...
    मीत

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  9. बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  10. Prreti,
    Meree URL badal jaaneke karan aapka link kho baithee thee..
    Rachnaakee har pakti apnaa alag wajood liye khadee hai...aur kya likhun?
    Mere kul 13 blogs hain..
    "lalitlekh"pe gar aap padhen,to shayad aapko achha lageaga.."maatru diwas"ke tehet kuchh likhaa hai..any sansmaranpar lekhbhee hain..
    Intezaar rahegaa..
    shama

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  11. lahar ki peeda mein chupi ek aurat ke dard ko is tarah bayan karna kabil-e-tarif hai.

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