
जिस रात में, मिली थी,
मुझसे मेरी महोब्बत,
उस रात ही कहीं पे,
दिल खो दिया था मैंने।
बन फूल, खिल रही थी,
तितली-सी उङ रही थी,
होठों की एक हंसी ने,
मन छू लिया हो जैसे।
बिन घुंघरूओं के बजती,
पैरों में अब तो पायल,
मैं नाचती थिरकती,
दिल झूमता है ऐसे।
लगने लगा है सबकुछ,
अब तो नया-नया सा,
शायद ये ख्वाब वाली,
नई उम्र हो जैसे।
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प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र - साभार गूगल)