Tuesday, April 14, 2009

मेरी कल्पनाएं और मेरे शब्द...

चांद को चांद न कहूं,
रजनी का चिराग कहूं,
तारों को तारे न कहूं,
निशा की बारात कहूं।



देख कर यूं पलटना,
ये लहरें नहीं,
सागर की अंगड़ाई हैं,
दर्द के भंवर ने जैसे,
कहीं गर्म हवा सहलाई है।


पक्षियों का चहकना भी,
हो जैसे मीठा राग कोई,
एक कतार में बैठे हो,
कई कलाकार कोई।



नदिया भी जैसे,
आईना हो कोई,
जिसपे संवर कर,
प्रकृति भी इतराती है
झूम कर आती है जब,
काली बदरा,
देखो कैसे,
शरमा के बरस जाती है।
............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

27 comments:

  1. सुन्दर उपमा आपकी तारे हैं बारात।
    बहुत बधाई आपको बेहतर है सौगात।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. wah! subah or khubshurat ho gai. narayan narayan

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  3. wah! subah or khubshurat ho gai. narayan narayan

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  4. पक्षियों का चहकना भी,
    हो जैसे मीठा राग कोई,
    ... बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति ।

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  5. जाने पहचाने दृश्य को नई नवेली उपमाओं से संवारा है आपने.

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  6. बहुत सुन्दर.

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  7. दर्द के भंवर ने जैसे,
    कहीं गर्म हवा सहलाई है।

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  8. झूम कर आती है जब,
    काली बदरा,
    देखो कैसे,
    शरमा के बरस जाती है।
    bahut hi khubsurat abhivyakti

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  9. बेहद खूबसूरत भाव हैं .....बहुत ही प्यारी है

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  10. बहुत सुन्दर भाव पूर्ण रचना है। बधाई।

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  11. प्रक्रति का सुंदर चित्रण कर दिया आपने अपने शब्दों के द्वारा...
    बहुत अच्छा लगा... सुंदर...
    सच में अगर हम सोचे तो प्रक्रति का कितने ही तरीकों से चित्रण हो सकता है...
    मीत

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  12. कमाल की रचना है...शब्द और भावः दोनों बेजोड़...
    नीरज

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  13. aapki kalpnayein aur aapke shabd dono hi lajawab hain.

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  14. प्रीती जी,

    बहुत ही मीठी बात कही है :-

    नदिया भी जैसे,
    आईना हो कोई,
    जिसपे संवर कर,
    प्रकृति भी इतराती है
    झूम कर आती है जब,
    काली बदरा,
    देखो कैसे,
    शरमा के बरस जाती है।

    अच्छी रचना के लिये, बधाईयाँ.

    मुकेश कुमार तिवारी

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  15. नदिया भी जैसे,
    आईना हो कोई,
    जिसपे संवर कर,
    प्रकृति भी इतराती है
    बहुत सुन्दर कल्पना व प्रस्तुति है बधाई
    युग्म पर मेरी गज़ल पर टिपण्णी हेतु आभार
    श्याम सखा श्याम
    कविता या गज़ल में हेतु मेरे ब्लॉग पर आएं
    http://gazalkbahane.blogspot.com/ कम से कम दो गज़ल [वज्न सहित] हर सप्ताह
    http:/katha-kavita.blogspot.com/ दो छंद मुक्त कविता हर सप्ताह कभी-कभी लघु-कथा या कथा का छौंक भी मिलेगा
    सस्नेह

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  16. पक्षियों का चहकना भी,
    हो जैसे मीठा राग कोई,
    एक कतार में बैठे हो,
    कई कलाकार कोई।

    नदिया भी जैसे,
    आईना हो कोई,
    जिसपे संवर कर,
    प्रकृति भी इतराती है


    waah!bahut hi sundar chitran hai...sundar kavita Preeti ji.

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  17. क्या बात है...
    सुंदर कल्पना की सुंदर शब्द-सज्जा

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  18. ajee मैंने कहा वाह....वाह...वाह....वाह....वाह....बहुत खूब....और कहूँ तो क्या कहूँ....??

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  19. पक्षियों का चहकना भी,
    हो जैसे मीठा राग कोई,
    एक कतार में बैठे हो,
    कई कलाकार कोई...

    बहुत ही खूबसूरत कविता है ये आपकी....

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  20. बहुत ही खूबसूरत

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  21. Salona he tera davat.... saloni he teri kalam...
    sundar he kalpna or sundar he tera srujan...

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