Sunday, April 5, 2009

प्रिय.......तुम मन को छू लो।





प्रिय,
तुम मन को छू लो,
मैं अंतर्मन को छू लूंगी,
पास तुम्हारे जितनी दुनिया,
रंग खुशियों के भर दूंगी।

पंख लगे हर सपने में,
जब आभास तेरा, बने पंख मेरे,
चुन लूं हर वो तारा जिसपे,
गुदे हुए हैं नाम तेरे।


सोज़ तुम्ही मेरा, साज़ भी तुम हो,
मेरे दिल की हर बात भी तुम हो,
सांसों से जो दिल तक जाती,
वो हसरत, वो चाहत भी तुम हो।


आहिस्ता-आहिस्ता से तैर रहे हैं,
ख्वाब तुम्हारे, इन आंखों में
बंद किये बैठी हूं पलकें,
रात समझ के सहर को मैं।
.............
प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र- साभार गूगल)

22 comments:

  1. कविता के भाव मन को छू गये।
    सुन्दर।

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  2. is this your first poem? well nice try!

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  3. तुम मन को छू लो,
    मैं अंतर्मन को छू लूंगी,
    पास तुम्हारे जितनी दुनिया,
    रंग खुशियों के भर दूंगी।
    ... सुन्दर रचना, प्रभावशाली अभिव्यक्ति है।

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  4. बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति!!

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  5. आहिस्ता-आहिस्ता से तैर रहे हैं,
    ख्वाब तुम्हारे, इन आंखों में
    बंद किये बैठी हूं पलकें,
    रात समझ के सहर को मैं।


    BAHOT HI BHAVPURN ABHIBYAKTI ... AUR SUNDAR VICHAAR/....DHERO BADHAYEE


    ARSH

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  6. आहिस्ता-आहिस्ता से तैर रहे हैं,
    ख्वाब तुम्हारे, इन आंखों में
    बंद किये बैठी हूं पलकें,
    रात समझ के सहर को मैं।

    भावपूर्ण अभिव्यक्ति ....

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  7. बंद किये बैठी हूं पलकें,
    रात समझ के सहर को मैं।
    bahut khoob....

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  8. बहुत सुंदर भाव ... अच्‍छी अभिव्‍यक्ति।

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  9. बहुत सुन्दर भाव हैं।

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  10. बहुत सुन्दर भाव हैं।

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  11. बहुत सुन्दर भाव हैं।

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  12. बहुत सुन्दर भाव

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  13. waah................bahut hi sundar aur gahre bhav.
    priy,tum man ko choo lo.main antarman ko choo lungi.

    in lines mein hi poori dastan bayan ho jati hai.

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  14. वाह जी वाह मन को छू लिया आपकी कविता ने
    लेकिन काफी अंतराल के बाद मत लिखा करो जल्‍दी जल्‍दी पढाते रहा करो
    काफी दिनों बाद नजर आए कभी आप आते भी नहीं हमारे मोहल्‍ले की तरफ

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  15. बहुत ही भावपुर्ण और सुकोमल अभिव्यक्ति. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  16. पंख लगे हर सपने में,
    जब आभास तेरा, बने पंख मेरे,
    चुन लूं हर वो तारा जिसपे,
    गुदे हुए हैं नाम तेरे।
    मीठी-मीठी और भाव भीनी अभिव्यक्ति। वाह

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  17. jaisa naam hai........vaisi hi kavita hai yah....mujhme bhi preet jagaati si....saans men khusboo ki tarah aati-see....jaati-si....!!

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  18. प्रिय,
    तुम मन को छू लो,
    मैं अंतर्मन को छू लूंगी,
    पास तुम्हारे जितनी दुनिया,
    रंग खुशियों के भर दूंगी।
    ये प्रथम की पंक्तियाँ ही सीधी ह्रदय में उतर गयीं...
    प्रेम से सराबोर सुंदर रचना...
    बहुत अच्छी लगी...
    मीत

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  19. प्रिय,
    तुम मन को छू लो,
    मैं अंतर्मन को छू लूंगी,
    पास तुम्हारे जितनी दुनिया,
    रंग खुशियों के भर दूंगी।

    प्रीती जी आप तो लजवाब लिखती ही हैं । इस रचना की ये लाइने दिल को छू गयी-

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  20. प्रिय मित्र
    सादर अभिवादन
    आपके ब्लाग पर रचनाएं पढ़कर हार्दिक प्रसन्नता हुई। आप इन्हें प्रकाशित कराने के लिए अवश्य ही भेजं। यदि पत्रिकाओं की समीक्षा के साथ साथ उनके पते भी चाहिए हो तो मेरे ब्लाग पर अवश्य ही पधारें। आप निराश नहीं होंगे।
    अखिलेश शुक्ल्
    http://katha-chakra.blogspot.com

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