दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।
जिसकी छाया में
सारे दिन की थकान,
छूमंतर हो जाती।
जिसके हाथों की गरमाहट,
माथे को सहलाती,
अपने होने का
एहसास कराती,
और हर मुश्किल
आसान हो जाती।
दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।
कुछ कहने से पहले ही,
सब कुछ समझ जाती,
मन की इच्छाओं को,
भांप जाती,
गलती होने पर,
कभी डांटकर तो कभी, प्यार से समझाती,
दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।
मां का आंचल।
जिसकी छाया में
सारे दिन की थकान,
छूमंतर हो जाती।
जिसके हाथों की गरमाहट,
माथे को सहलाती,
अपने होने का
एहसास कराती,
और हर मुश्किल
आसान हो जाती।
दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।
कुछ कहने से पहले ही,
सब कुछ समझ जाती,
मन की इच्छाओं को,
भांप जाती,
गलती होने पर,
कभी डांटकर तो कभी, प्यार से समझाती,
दिल ढूंढता है फिर वही,
मां का आंचल।
..........
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)






