Sunday, December 14, 2008

फिर मूक बने हो तुम...

बाहर की गन्दी नजरों से,
घर अपना ही जला बैठे,
फिर, मूक बने हो तुम,
नज़रें अपनी ही झुका बैठे,

इक मां की ही,
पैदाइश होकर,
छीन रहे किसका दामन,
अपने चेहरे पर आतंकी का,
क्यों ये चेहरा लगा बैठे,

बात नहीं किसी धर्म की है,
न ही रंग का भेद यहां,
ये बात है उस मां की,
और उस मिट्टी की,
जिसका दामन तुम,
खुद अपने हाथों जला बैठे।।
............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

39 comments:

  1. प्रीती जी ! हम तो ऊपर के बोर्ड पर ही मर मिटे . ऐसी चींजें जिन्दगी में कुछ ही होती हैं आज उन्ही मे से एक ये हुई मेरे साथ इसके साथ आपका यह एहसान भी याद रहेगा . बहुत बहुत दिली धन्यवाद !

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  2. सटिक , सामयिक और लाजवाब रचना !

    राम राम !

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  3. aaj ki paristhiti ko sadhe dhang se darshaati rachna.....

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  4. बहोत ही बढ़िया कविता लिखा है आपने प्रीती जी,ऊपर लगी हुई तस्वीर आपकी कविता को मजबूती देने के साथ साथ सार्थकता भी देता है बहोत ही सुंदर मनोभाव लिखी एक बेहतरीन कविता पढ़ने को मिली... बहोत बधाई आपको प्रीती जी ...
    नई ग़ज़ल आज शाम के महफ़िल में सजेगी आपको आमंत्रित करता हूँ अभी से ही..
    अर्श

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  5. बहुत अच्छा लिखा है प्रेरणादायक
    सही कहा कहीं न कहीं कसूरवार हम ही हैं....


    अक्षय-मन

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  6. क्या बात है, बहुत सुंदर कविता, सुंदर भाव.
    धन्यवाद

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  7. सुंदर भाव बहुत सुंदर कविता.धन्यवाद.

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  8. बात नहीं किसी धर्म की है,
    न ही रंग का भेद यहां,
    ये बात है उस मां की,
    और उस मिट्टी की,
    जिसका दामन तुम,
    खुद अपने हाथों जला बैठे।।

    bahut sunder rachana

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  9. गहरी एवं प्रशंसनीय मनोभिव्यक्ति पर बधाई!

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  10. प्रिय तारिका,
    इतनी सुन्दर भावाभिव्यक्ति पर आपको बहुत बधाई और इतने के ऊपर आज ढे़र सारा आशीर्वाद भी. बहुत बेहतर बन पडी़ है कविता, आज तारिका आपकी. इसे कायम रखना और मुझे सदा अपने साथ पाना. प्रेमाशीर्वाद सहित.

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  11. नज़रें झुकाकर मूक बन कर घर अपना जला दिया
    एक माँ होने पर भी उसका ही दामन जला दिया

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  12. अच्छा िलखा है आपने । जीवन के सच को प्रभावशाली तरीके से शब्दबद्ध िकया है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है -आत्मिवश्वास के सहारे जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-

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  13. अब समझाइश का कोई असर नही होने वाला /सुफैद कपडे को इतना काला कर दिया गया है कि उस पर समझाइश के छींटों का कोई फर्क नही पड़ने वाला /ऐसा क्यों कर रहे हैं इसका जवाब ही नही है उनके पास ब्रेन वाश

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  14. बात नहीं किसी धर्म की है,
    न ही रंग का भेद यहां,
    ये बात है उस मां की,
    और उस मिट्टी की,
    जिसका दामन तुम,
    खुद अपने हाथों जला बैठे।।
    पता नहीं कब समझेंगे ये लोग...
    ---मीत

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  15. Hii

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  16. aapki rachana bahut shandar lagi
    inhi tevaro ko barkarar rakein
    kabhee apne blog par bhee padhare

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  17. ऊपर की तस्वीर को देर तक देखता रहा .लगा जैसे कविता यही कह रही है....किस जगह की फोटो है......




    बाहर की गन्दी नजरों से,
    घर अपना ही जला बैठे,
    फिर, मूक बने हो तुम,
    नज़रें अपनी ही झुका बैठे,

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  18. Excellent poem really.. photo bhi sahi lagaya... dekhiye sadbudhi mile shayad isse.. lekin lagta nahi hai.. jisse bhi milta hu sabhi bahut kattarwadi ho gaye hai..

    New Post - एहसास अनजाना सा.....

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  19. kaafi samay baad aapke blog ko padha...aur ek samvedanshil kavita padhne mili...behtarin...

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  20. अच्छी कविता के लिये बधाई स्वीकारें

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  21. मौजूं कह दिया आपने। मुंबई हमलों ने भारतीय जनता को एक मुखर विरोध करने पर उतारू कर दिया। ये लोकतंत्र का मूल अधिकार अब सार्थक रूप में सामने आया है, वरना इससे पहले तो नेताओं ने इस अधिकार से हित साधने के लिए जनता को प्रायोजित ही किया है।

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  22. प्रीति जी,
    सुंदर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    निम्न लाइनों पर .....
    इक मां की ही,
    पैदाइश होकर,
    छीन रहे किसका दामन,
    अपने चेहरे पर आतंकी का,
    क्यों ये चेहरा लगा बैठे,

    मैं तो ये कहना चाहूँगा कि अधिक खतरा तो हमें आतंकी चेहरा लगाये बैठे लोगो से नही , बल्कि सफेदपोश बने आतंकियों और उनके छुपे सरपरस्तों से है.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  23. sahi main bahut he khubsoorat likha hai aapne....har ek line is kavita ka aaj ka situation keh raha hai....

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  24. इक मां की ही,
    पैदाइश होकर,
    छीन रहे किसका दामन,
    अपने चेहरे पर आतंकी का,
    क्यों ये चेहरा लगा बैठे,
    बहुत सुंदर भाव सुंदर शब्द संयोजन

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  25. is tasveer ki tareef kiye bagair tippani adhoori hai..
    "uparyukt" mudde pe ek "upyukt" kavita :)

    isi vishay pe likhi ek ghazal par nazar daale aur maargdarshan kare

    http://pyasasajal.blogspot.com/2008/12/blog-post_23.html

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  26. kya kahun....aur kahane ko kyaa rah gayaa....???

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  27. नववर्ष की हार्दिक ढेरो शुभकामना

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  28. क्या खूब कहा है, इस आपकी रचना में दो कविताएं हैं एक कविता वो जो आपने नीचे लिखी है और दूसरी कविता बोर्ड पर लिखी है। वाह। आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  29. इक मां की ही,
    पैदाइश होकर,
    छीन रहे किसका दामन,
    अपने चेहरे पर आतंकी का,
    क्यों ये चेहरा लगा बैठे,

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  30. बात नहीं किसी धर्म की है,
    न ही रंग का भेद यहां,
    ये बात है उस मां की,
    और उस मिट्टी की,
    जिसका दामन तुम,
    खुद अपने हाथों जला बैठे।।
    अच्छी कविता के लिये बधाई स्वीकारें

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  31. मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
    मेरे तकनीकि ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं

    -----नयी प्रविष्टि
    आपके ब्लॉग का अपना SMS चैनल बनायें
    तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

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  32. प्यारी तारिका,
    आपकी क़लम इतने दिनों से से ख़ामोश क्यूँ है ? चलाइए चलाइए उसे । क्या ही अच्छा लिखती हैं आप ! हम इन्तज़ार में हैं । अपने इस बिगब्रदर की इतनी तो बात मानेंगी ना ? और इस बार फिर किसी सुन्दर चित्र के साथ आइएगा जैसा वो प्यारा छोटू था ओ. के. ?
    हम सब ब्ला॓गर इन्तज़ार करेंगे. पोस्ट की सूचना मेल कर दीजिएगा. सहूलियत के लिए.
    आपका शुभचिंतक

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