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Sunday, June 13, 2010

महकते रंग गुल में........






महकते रंग गुल में,
गुलज़ार होते हैं,
मचलते ख़्वाब,
स्वप्न के पार होते हैं,



ना जाने क्यों,
मोहब्बत इम्तहां लेती,
जो भी डूबते इसमें,
वही कुर्बान होते हैं,



बङी खूबी से गिरते हैं,
ये पतझङ के जो पत्ते हैं,
नाम पत्ता रखा इनका,
रंग खो कर भी सवरते हैं,



जाम कोई भी हो साक़ी,
नशा वो दे ही देती है,
और ये इश्क का जलवा,
दवा भी जाम जैसी है,
........... 
प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र साभार गूगल)

Monday, April 27, 2009

कभी वक्त मिले मुझसे, तुम मिलने आ जाना.....

जज़्बात महोब्बत के,
सीने में धङकते हैं,
फुरसत में कभी तुम भी,
इससे सुनने आ जाना।
मैं तन्हा हूं फिर भी,
कुछ बाते करती हूं,
कभी वक्त मिले,
मुझसे,
तुम मिलने आ जाना।



रह-रह के मचलता र्है,
आंखों में जो बसता है,
वो सपना बनकर के,
तुम मुझको सुला जाना।
मैं नींद में रहकर भी,
कुछ देखा करती हूं,
तुम पास मेरे आकर,
कभी मुझको जगा जाना।



फिर खोल के जुल्फों को,
सुलझाने बैठूं तो,
तुम अपने हाथों से,
इनको सहला जाना।
इन काले केसू में,
कुछ सूनापन सा है,
एक फूल महोब्बत का,
चुपके से लगा जाना।



बारिश के मौसम में,
जब भीग रहे हो तुम,
बस अपना समझकर के,
मुझे पास बुला लेना,
मैं आदत से अपनी,
कुछ शरमा जाऊं तो,
तुम बाहों में भरकर,
मुझे गले लगा लेना।
............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)

Saturday, April 25, 2009

ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजिए.....

कहने को तो कहते हैं,
हम तोङ के लायेंगे,
इन चांद सितारों को,
भर देंगे दामन हम,
जों मोतियों की बारिश हो।



पत्थर को तराशेंगे,
नाखूनों से अपने,
जब तक न बन जाए,
मूरत मेरे माही की।



चुन लेंगे फूलों को,
तेरी महक घुली जिनमें,
फिर बन जोगी तेरा,
तेरे नाम की माला को,
होठों में फिरायेंगे।
...........
प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र- साभार गूगल)