जिन्दगी अब मुझे,
यूं भाती नहीं,
कितना भी आंसुओं को रोक लें,
हंसी आती नहीं,
यूं भाती नहीं,
कितना भी आंसुओं को रोक लें,
हंसी आती नहीं,
हर मोङ पर सिर्फ,
दर्द और तन्हाईयां हैं,
जिधर भी नज़र डाले,
तङपती परछाइयां हैं,
दर्द और तन्हाईयां हैं,
जिधर भी नज़र डाले,
तङपती परछाइयां हैं,
वो भी (परछाइयां) मुझे देखकर,
मुझसे ही दूर जाती रहीं,
कितना भी आंसुओं को रोक लें,
हंसी आती नहीं,
जिन्दगी अब मुझे,
यूं भाती नहीं।
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मुझसे ही दूर जाती रहीं,
कितना भी आंसुओं को रोक लें,
हंसी आती नहीं,
जिन्दगी अब मुझे,
यूं भाती नहीं।
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प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र-साभार गूगल)





