जाने क्या बात है.....
दर्द भी,
शीशे सा हुआ जाता है,
हर मोङ पर गर्म होता है,
और...पिघल जाता है....,
तङपाता है.......,
जाने क्या बात है.......।।
मैं तो समझी थी,
कि वो जख़्म,
भर गया होगा,
जो फटा था छाला,
वो भी संभल गया होगा,
पर न जाने...कहां से,
फिर वही, टीस उठी,
छुपी आंखों में कहीं से,
वही चीख उठी,
बङा मुश्किल है,
खुद को ही ये समझाना,
कभी आंखों में आस के,
जलते दिये ना जलाना,
ये तो एक ख़्वाब है,
जो जगा रहता है,
न चाह कर भी....,
दिल में दबा रहता है,
जाने क्या बात है.........।।
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प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र – साभार गूगल)



