Friday, June 25, 2010

जाने क्या बात है............




जाने क्या बात है.....
दर्द भी,
शीशे सा हुआ जाता है,
हर मोङ पर गर्म होता है,
और...पिघल जाता है....,
तङपाता है.......,
जाने क्या बात है.......।।



मैं तो समझी थी,
कि वो जख़्म,
भर गया होगा,
जो फटा था छाला,
वो भी संभल गया होगा,
पर न जाने...कहां से,
फिर वही, टीस उठी,
छुपी आंखों में कहीं से,
वही चीख उठी,





बङा मुश्किल है,
खुद को ही ये समझाना,
कभी आंखों में आस के,
जलते दिये ना जलाना,
ये तो एक ख़्वाब है,
जो जगा रहता है,
न चाह कर भी....,
दिल में दबा रहता है,
जाने क्या बात है.........।।
...........
प्रीती बङथ्वाल तारिका
(चित्र साभार गूगल)
 

9 comments:

  1. भावपूर्ण रचना।

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  2. शानदार अंदाज में कोमल जज्बातों की प्रस्तुति ।

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  3. सुंदर अभिव्यक्ति ,शुभकामनायें

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  4. ये तो एक ख़्वाब है,
    जो जगा रहता है,
    न चाह कर भी....,
    दिल में दबा रहता है,

    मन के भावों को बहुत ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया हैं आपने .

    बहुत बढ़िया रचना .

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  5. Preetiji, Aap bhav bodh se sampann hain. seedhi sapaat shaili men apnee baat kahne ki dakshata aap ko hasil hai. par kavita ko kavita hone ke liye ekdam sapat hone se bachaana padata hai. aap ka dhyan jaroor is baat par hoga. aap ke blog ko dla daily newpaper ke blogchintan me is shanivaar ko shamil kiya ja raha hai.
    www.bat-bebat.blogspot.com

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  6. गज़ब की भावभरी रचना……………………दिल मे उतर गयी।

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  7. हैलो प्रीति जी

    कुछ दिनो के अंतराल पर आपके ब्लॉग पर आना हुआ
    देखा तो दो दो पोस्ट आ चुकी है

    दोनों ही सुंदर रचनाएँ है
    लगता है आप form मे आ रही है फिर से
    आप कई बार पुराने मशहूर नगमो की पहली पंक्ति ले कर
    उसे अपने ही रंग मे रंग कर पेश करती है
    बढ़िया प्रयोग है

    शुभकामनाएँ

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  8. जाने क्या बात है! वाह क्या बात है। बहुत खूब!

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