Showing posts with label अजनबी. Show all posts
Showing posts with label अजनबी. Show all posts

Thursday, September 25, 2008

अजनबी ही रहने दो

अजनबी ही रहने दो,
अब ये रास्ते हमारे,
खुद लहू हो जाएंगे,
जो अब, हम इसे सवारें,
अजनबी ही रहने दो,
अब ये रास्ते हमारे।

बिखरे हुए ख्वाबों की,
एक किताब लिख रही थी,
ज़मी से लेकर उन रास्तों की,
हर बात लिख रही थी,
उनमें कुछ लम्हों को हमने,
आंसुओं में भी उतारे,
अजनबी ही रहने दो,
अब ये रास्ते हमारे।

दिल जानता था वो लम्हा,
मेरे आस-पास ही कहीं था,
वो, न दूर होगा मुझसे,
इस बात का यंकी था,
पर फिर भी उसके एहसास को हमने,
अन्धेरों में गुजारे,
अजनबी ही रहने दो,
अब ये रास्ते हमारे।
............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र-सभार गुगल)