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Friday, August 7, 2009

कहीं खोया हुआ अपना, वो सामान मिल जाए............






कहीं खामोश पन्नों पे,
बीते लम्हों की कहानी,
बदलते वक्त की हसरत,
बदलती जिन्दगानी।



मुसाफिर भी बने इसमें,
हमसफर भी बनने आये,
मुकद्दर में ही, न था जो,
वो, दर से ही लौट आये।



पत्थर के मकां भी थे,
मिट्टी की मजारें भी,
दरारें उसमें भी उतनी ही,
दरारें इसमें थी जितनी।



पिघलती रूह में अक्सर,
अक्श अपना दिखाई दें,
मचलते दिल की वो हसरत,
दबी चीखें सुनाई दें।



फिर से, यूं ही चलेंगे हम,
लेके अपने, ख्वाबों का पिटारा,
शायद यूं ही “तारिका”
कोई खोया हुआ अपना,
कहीं सामान मिल जाए।
.............
प्रीती बङथ्वाल “तारिका”
(चित्र - साभार गूगल)