Sunday, July 13, 2008

कुछ पन्ने मेरी किताब के......

भाग ३- ‘अपनों की कशिश’

“ दिल उजले पाक फूलों से, भर दिया था किसने,
उस दिन, हमारी आखों से अश्क बह रहे थे ”।

दरवाजे की घण्टी ने अचानक मुझे अपने ही तसव्वुर से जगाया। होश में आते ही लगा क्या ये ख्वाब है, नहीं..... मैं दरवाजे की और भागी। दरवाजा खोला तो हक़ीकत का अंदाजा हो गया। सब दरवाजे पर थे, अरे....ये सपना नही, सच है । ये शब्द मन ही मन, मैं बार-बार अपने आप से कहे जा रही हूं। काफी दिनों के बाद सबसे मिलना हुआ और मिलते ही दिल बाग-बाग हो गया, मेरे लिए मेरा घर जन्नत हो गया। समझ नही आ रहा है कि वो मेरी खुशी में शामिल हैं या मैं अपनी खुशी को उनके साथ देख रही हूं।
आज वो दिन है जब पहली बार मेरे चांद का अपने ननिहाल से स्पर्श हुआ। मेरा बेटा अपने ननिहाल की गोद में खेल रहा है। एक-एक कर सबने उसे अपनी गोद में लेकर खिलाया। ये सब देखकर मन बहुत खुश हो रहा है।
अब वक्त हो गया, फिर से अपनों से जुदा होने का। दिल में फिर एक टीस उठी जो उन्हें जाते हुए देख आखों से बह निकली। मेरे अपने फिर से दूर जाते हुए मेरी आखों से ओझल हो गये। आज रात आखों में नींद का आना तो जैसे वर्जित है। सारी रात आंखों में पूरे दिन की कहानी चलती रही।
अब अपने से ज्यादा अपने बेटे के बारे में सोचती हूं। उसे भी अपने हिस्से की सारी खुशियां पाने का हक़ है। यही सोच कर मेने अपने हमसफर को अपनी एक खव्वाहिश के बारे में बताया जिसे सुन वो राजी भी हो गए। मेरी हालत को समझते हुए वो मान गए। हमने, नाना-नानी से नाती को मिलाने का प्लान बनाया, शायद उसे देख कर ही उनका मन कुछ स्थिर हो। सिर्फ नाना-नानी ही तो रह गए हैं जिन्होंने मेरी आंख के तारे को अभी तक नहीं देखा है। सिर्फ वो ही तो नाती से मिलने नही आए हैं। हमने सोचा हम ही अपने ढाई महिने के बेटे को लेकर उनसे मिलने चले जाए। लेकिन मन काफी कशमकश में था और काफी सवालों से घिर गया था। वो हमें आने देंगे या नहीं, हमसे मिलेगें भी या.....? ऐसे ही कई सवाल हर समय जहन में घूम रहे है और दिल-दिमाग को परेशान कर रहे हैं।

“कुछ हसरतें पूरी हुई, कुछ हसरतों के बाद,
कुछ का होना अभी बाकी है, मैं इंतजार में हूं......”


प्रीती बड़थ्वाल

Thursday, July 10, 2008

एक आशियाना थी..........


बदलती तकदीरों का आशियाना थी,
शायद आज भी जिन्दगी मेरी, एक अफसाना थी,
खुशियां थी मगर, तब्बसुम की महक से दूर थी,
सिर्फ मोतियों सी बूंदे थी, जो टीस का तराना थी,
शायद आज भी जिन्दगी मेरी, एक अफसाना थी।
सपने थे जो आंसुओं के संग, बह निकले थे,
जिनका दूर तक न साहिल था, न सहारा था,
टूटी हुई कश्ती थी, जिसका कोई न सहारा था,
शायद आज भी जिन्दगी मेरी, एक अफसाना थी।
शायद आज फिर कोई मुझे दस्तक दे रहा था,
आखों ही आखों में, होले से कुछ कह रहा था,
मैं हूं तेरे साथ, अभी और चलना है तुझे,
अपने टूटे सपनों से उभरना है तुझे,
शायद फिर खुशी, एक बार मुझे बुला रही थी,
मेरी तन्हाइयों की कङी तोङ कर मुस्कुरा रही थी,
शायद यही मेरी जिन्दगी का अफसाना था,
तकदीरों को लोट कर, मेरे पास ही आना था,
शायद आज भी जिन्दगी मेरी, एक अफसाना थी।
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प्रीती बङथ्वाल “तारिका”

Wednesday, July 9, 2008

कुछ पन्ने मेरी किताब के...

भाग २-इंतजार अपनों का



कहानी को आगे बढ़ाते हुए....

‘सितम को नत मस्तक जालिम को रुसवा हम भी देखेंगे,
चल-ऐ-अज्में बगावत चल, तमाशा हम भी देखेंगे’।

साल का पहला दिन ही मेरे लिए खुशियों की सौगात लेकर आया। मुझे खुद के लिए कम अपने बेटे के लिए ज्यादा खुशी हो रही है। हमारे घर पर, मेरे घर से पहली बार मेरे कुछ करीबी रिश्तेदार मिलने आ रहे हैं। मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। साल के पहले ही दिन मेरे अपने, मुझसे और मेरे बेटे से मिलने आएं चाहे वो थोड़े समय के लिए ही आएं महज़ एक या दो घंटे के लिए। लगता है ये साल मेरे जीवन में फिर से खुशियां ही खुशियां भर देगा। उनके आने का संदेशा मिल गया था सो मेने सुबह ही खीर बना ली। अब बाकी था तो सिर्फ और सिर्फ इंतजार। मेरे अपनों का इंतजार, मेरे अपने के लिए। जल्दी-जल्दी घर का सारा काम खत्म किया और फिर मैं बॉलकनी में खङे हो कर उनकी राह तकने लगी। एक-एक पल घंटे की तरह लग रहा था। जब भी अपनों को आने में देर होती है तो मन शंकाओं से घिर जाता है । कभी भी सही बात ध्यान नहीं आती। आते हैं तो सिर्फ गलत ही विचार ध्यान में। पहली बार आ रहे हैं पता नहीं रास्ता मिला या नहीं। घर का पता तो सही ही लिखा है ना। कहीं प्लान तो चेंज नहीं हो गया। प्लान चेंज होता तो कोई ना कोई फोन जरूर करता। कहीं मुझे बुरा लगेगा इसलिए फोन ही नहीं कर रहे हों। जहां तक नजर जा सकती थी देखती रही। अंजान की वो लाइनें याद आ रही हैं ‘इंतहां हो गई इंतजार की….’।
अब तो आस भी आंखों का साथ छोड़ने लगी थी। तभी, दूर से दो रिक्शे आते दिखाई दिए। फिर से आंख ने आस का दामन थाम लिया। सवाल सिर्फ ये कि दो-तीन घंटे का इंतजार रंग लाएगा। क्या सच ये वो ही हैं जिनका सुबह से मुझे इंतजार है। क्या ये जो आ रहे हैं मेरे अपने हैं। हां...हां...ये तो वो ही हैं। जिनका इंतजार मुझे कब से था। मेरी आंखें छलछला गई। मैं रोती जारही थी। मेरी आंखें उस धुंधले में भी उनको देखने के लिए तरसने लगी। दिल और दिमाग का संगम तो देखिए मैं रोना भी चाह रही हूं और उन्हें देखना भी। पहली बार आए इस एहसास ने मुझे रोमांचित कर दिया। कभी मैं उन्हें देख हाथ हिलाती तो कभी उसी हाथ से आंखों से निकलते धारा-प्रवाह को पोंछती। रिक्शा मेरे पास आता जा रहा था, मेरे घर का फासला महज कुछ मीटर ही रह गया, तब मैं अपने बेटे को गोदी में लेकर
आई और बोली, ‘देख तो कौन आ रहे हैं, बेटु तेरे अपने तुझे देखने आरहे हैं। मुझे तलाशती उनकीं नजरें इधर-उधर देख रहीं थीं और मैं चौथे फ्लोर अपने बेटे के साथ दोनों हाथों से खुशियां बटोर रही थी। आज मेरे अपने, मेरे पास हैं।
“मेरी आंखों में है इक अब्र का टुकड़ा शायद,
कोई मौसम हो सरेशाम बरस जाता है,
दे तसल्ली जो कोई, आंख छलक उठती है,
कोई समझाए तो दिल..और भी भर आता है।”

जारी है...


प्रीती बड़थ्वाल