
रूठी इन तकदीरों में,
हंसी भी मुस्कुरायेगी,
इसी इंतजार में शायद,
जिन्दगी बीत जाएगी।
कुछ खुले पन्ने थे,
तकदीर के रास्ते में,
जो जल गये थे शायद,
किसी हादसे में।
आंसुओं की बारिश थी,
पलकों की परछाइयों में,
फिर वही ख्वाहिश थी,
मेरी तन्हाइयों में।
शायद वो हवा फिर आएगी,
जो मेरी तन्हाइयों के साथ,
मुस्कुरायेगी,
इसी इंतजार में शायद,
जिन्दगी बीत जाएगी।
…………
हंसी भी मुस्कुरायेगी,
इसी इंतजार में शायद,
जिन्दगी बीत जाएगी।
कुछ खुले पन्ने थे,
तकदीर के रास्ते में,
जो जल गये थे शायद,
किसी हादसे में।
आंसुओं की बारिश थी,
पलकों की परछाइयों में,
फिर वही ख्वाहिश थी,
मेरी तन्हाइयों में।
शायद वो हवा फिर आएगी,
जो मेरी तन्हाइयों के साथ,
मुस्कुरायेगी,
इसी इंतजार में शायद,
जिन्दगी बीत जाएगी।
…………
प्रीती बङथ्वाल “तारिका”


