मैं पहले ग्रुप में थी। सबसे पहले गाना सलेक्ट किया गया। हमने सुहाग फिल्म से गाना चुना ‘ओ नाम रे, सबसे बङा तेरा नाम, ओ शेरों वाली’। ये गाना अपने आप में ही पूर्ण लगता है। इसकी शुरुआत जितनी धीरे है अंत उतना ही प्रभावशाली और तेज। डांडिया करने के लिए सही थीम वाला गाना। दूसरे ग्रुप का गाना गुजराती में था, वो गाना भी सुनने में अच्छा था, गाना श्रीकृष्ण भगवान पर था, सो उन्होंने अपने ग्रुप का नाम कृष्णा ग्रुप रख लिया। अब हमें भी अपने ग्रुप
का नाम रखना था। बहुत सोचा गया सभी से पूछा गया। सभी ने अच्छे-अच्छे नाम बताये (संस्कृति, संगम, सतरंगी, इन्द्रधनुष, संगिनी) । अंत में सभी संगिनी के लिए सहमत हो गये। नाम बताने के सभी के अपने दृष्टिकोण थे जो सही भी थे लेकिन सभी संगिनी के लिए मान गये। संगिनी का अर्थ सहेली, इसीलिए ये नाम हमसब को पसंद आया।जिस दिन प्रोग्राम होना था शाम का समय निश्चित किया गया। हमारा ग्रुप, दूसरे ग्रुप से पहले ही पहुंच गया था। सभी गुजराती तरिके से साड़ी पहन, सज-धज कर आये थे। प्रोग्राम थोड़ा देर से शुरू हुआ, धीरे-धीरे लोगों की भीड़ भी बढ़ने लगी थी। बहुत से लोगों के आने के बाद प्रोग्राम शुरू हुआ। शुरूआत अंताक्षरी से हुई, सास-बहू के दो ग्रुप बनाए गये कुछ लोग सास ग्रुप में और कुछ बहू ग्रुप में हो गये। फिर शुरू हुआ वो मुकाबला जिसे देखने के लिए पूरी सोसायटी बैठी हुई थी। वैसे तो ये प्रोग्राम सिर्फ महिलाओं का ही था पर पुरूष वर्ग ने भी इस में जमकर हिस्सा लिया।
अब सवाल हुआ कि डांडिया में कौन सा ग्रुप पहले अपना प्रदर्शन करेगा। हम लोग उन्हें और वो लोग हमें प्रदर्शन करने के लिए कह रहे थे। मतलब ये था कि पहले कोई भी नहीं करना चाहता था। दोनों ही दूसरे ग्रुप को पहले करते हुए देखना चाहते थे। जो ठीक से अपने और उनमें आंकलन कर सकें, कि बेहतर कौन? लेकिन शुरू तो किसी ने करना ही था तो हम लोग आगे आ गये। हमारा ग्रुप पूरे जोश में था।
बीच में कलश सजा हुआ था और उसके चारों और हम गोला बनाकर डांडिया खेलने लगे। हमने जो डांडिया पेश किया उसे देख कर दूसरी टीम ने पहले ही अपने दांतों तले उंगली दवा ली। वहां पर मौजूद लोगों ने भी विजेता हमे करार दे दिया था। लेकिन कोई किसी से कम ना था, टक्कर तो होनी ही थी। अब दूसरे
ग्रुप की बारी थी हम सोच के बैठ गए थे कि ये ग्रुप तो समझो गया, जीत हमारी ही होगी क्योंकि हमने कहीं पर भी गलती नहीं की थी। पर दूसरी टीम की काबलियत पर शक करके हम भूल कर रहे थे। दूसरी टीम ने भी जबरदस्त डांडिया किया और हमें ऐसी टक्कर दी कि हमारे हाथ उनकी वाह वाही में खुद ही उठ गए। कई गलतियां की उन्होंने, पर पहली बार की उनकी ये सफलता बताती है कि हमारा वर्चस्व हमेशा नहीं रहने वाला। कम वो नहीं निकले, लेकिन जीत तो हमारी ही होनी थी। जजों ने फैसला भी हमारे पक्ष में सुनाया पर पहली बार एंट्री करने के कारण बाद में दोनों टीमों को ही जीता करार दे दिया गया। हम भी काफी खुश थे कि चलो ये अच्छा हुआ कि किसी की हार ना ही किसी की जीत हुई। वर्ना पर्व के माहौल में खटास ही हाथ लगती है।
प्रीती बड़थ्वाल
