Tuesday, July 29, 2008

ये म्यारा पहाङ है.........



ये म्यारा पहाङ है,
ये म्यारा पहाङ...
हरी-हरी वसुन्धरा पे,
खिल रहें जो फूल से,
हवा भी बह रही है, जहां
छू के, बर्फ को सकून से,
अमृत सी हर बूंद जंहा,
कर रही श्रंगार है....,
ये म्यारा पहाङ है,
ये म्यारा पहाङ...

ये ऊंचे-ऊंचे वृक्ष यहां,
अपने में इसकी शान है,
यहां फल और फूल ही क्या,
यहां जङी-बटियों की खान हैं,
ये म्यारा पहाङ है,
ये म्यारा पहाङ...
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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

Monday, July 28, 2008

बस मां के पास...........


वो डबडबाती आंखे,
वो बिलखती आंखे,
खून से सनी वो,
हैं किस बच्चे की सांसे।

जो पुकारता किसी अपने को,
जो ढूढंता किसी अपने को,
जिसे देख कर कोई भी,
जान न पाये उसे,और उसके अपने को।

मां...आ...मां...आ...का रूदन करता वो,
बिना सांस लिए दोहराये,
वो प्रश्न लिए आंखों में,
सब ओर यूं तकता जाये,

शायद, कोई अपना देख रहा हो,
जो पास उसके आ जाये,
और गोदी में उसे उठा कर,
बस, मां के पास ले जाये।
बस, मां के पास.............
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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"

Friday, July 25, 2008

ख़ाब के पन्नों पे.........

ज़मी पर बिछी,
रेत के आंसुओं से बनी,
जिन्दगी मेरी,
जो ख़ाब के पन्नों पे लिखी थी।
कभी मुस्कुरा कर वो,
गुलाब की पंखुङी बनती,
तो कभी दर्द के आंसुओं से,
ओंस की बूंदे बनी थी।
जिन्दगी मेरी,
जो ख़ाब के पन्नों पे लिखी थी।
कभी पत्थरों से भी,
खुशियों की आस करती,
तो कभी अपनी खुशियों को,
पत्थर बना बैठी।
वो मेरी तन्हाईयों की,
आवाज़ भी न बनी थी,
कि अपने जले पन्नों का,
मातम मना बैठी।
जिन्दगी मेरी,
जो ख़ाब के पन्नों पे लिखी थी।
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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"