
ये म्यारा पहाङ है,
ये म्यारा पहाङ...
हरी-हरी वसुन्धरा पे,
खिल रहें जो फूल से,
हवा भी बह रही है, जहां
छू के, बर्फ को सकून से,
अमृत सी हर बूंद जंहा,
कर रही श्रंगार है....,
ये म्यारा पहाङ है,
ये म्यारा पहाङ...
ये म्यारा पहाङ...
हरी-हरी वसुन्धरा पे,
खिल रहें जो फूल से,
हवा भी बह रही है, जहां
छू के, बर्फ को सकून से,
अमृत सी हर बूंद जंहा,
कर रही श्रंगार है....,
ये म्यारा पहाङ है,
ये म्यारा पहाङ...
ये ऊंचे-ऊंचे वृक्ष यहां,
अपने में इसकी शान है,
यहां फल और फूल ही क्या,
यहां जङी-बटियों की खान हैं,
ये म्यारा पहाङ है,
ये म्यारा पहाङ...
............
यहां फल और फूल ही क्या,
यहां जङी-बटियों की खान हैं,
ये म्यारा पहाङ है,
ये म्यारा पहाङ...
............
प्रीती बङथ्वाल "तारिका"


