Thursday, July 17, 2008

कुछ पन्ने मेरी किताब के.......

भाग 4- वो खुशी के पल...

“क्या चारा करें, क्या सब्र करें, जब चैन हमें दिन रात नहीं,
ये अपने बस का रोग नहीं, ये अपने बस की बात नहीं।”




बहुत कशमकश के बाद और बङी हिम्मत के साथ अपने सवालों के डर से बाहर निकल कर हमने घर पर फोन करके बात करना उचित समझा ताकि सही हालात का जायजा मिल सके। फोन पापा ने ही उठाया और पापा से मेरी बात हुई। उनसे पता चला कि मेरी बहन शादी के बाद पहली बार घर रहने आई हुई है और वो हमारा घर पर आना पसन्द नही करेगी। हम जान गए की हम घर नही जा सकते थे। हमने भी मौके की नजाकत को समझते हुए घर न जाने का फैसला किया। लेकिन मन में फिर उदासी ने अपना डेरा जमा लिया और काफी देर तक यही सोच कर आंखें नम होती रही कि ये कैसी किस्मत है, ना तो वो ही आ सके और ना ही, हम जा सकते हैं। ऐसा कब तक होता रहेगा? सोचते हुए मैं अपने में खोती चली गयी। कब नींद ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया मुझे पता ही नही चला, कुछ देर बाद जैसे किसी ने मुझे आवाज़ दे कर जगाया हो। ‘वो’ मेरे पास ही बैठे हुए थे और मेरा सर धीर-धीरे सहला रहे थे। मेरी हालत उनसे छुपी नहीं थी ‘वो’ बोले, ‘उदास होने की जरूरत नहीं है अगर हम घर नही जा सकते तो कोई बात नहीं, कहीं बाहर तो मिल ही सकते हैं’। मुझे भी ये बात ठीक लगी, आखिर बहुत न सही तो थोङा ही सही, थोङे में भी खुश रहना चाहिए। अब इंतजार किसी मौके का था।
कुछ दिनों बाद ही हमें ऐसा मौका मिल भी गया, जिसका हम काफी समय से इंतजार कर रहे थे। हमारा घर के पास के मार्केट में जाना हुआ और हमने वहां पहुंच कर पापा के मॉबाइल पर फोन किया। हमने उन्हें बताया कि हम किसी काम से यहां आये हुए है अगर आप भी आ सके तो हमारा मिलना भी हो जायेगा। उधर से कोई सही-सा जवाब नहीं मिला, लेकिन दिल उनका भी हमसे और हमसे ज्यादा नाती से मिलने का हुआ। इसलिए मुझे महसूस हुआ कि वो जरूर आयेंगे।
जैसा सोचा था बैसा ही हुआ। जैसे ही हम अपनी खरीददारी करके जाने लगे तभी मोबाइल की घंटी ने हमें अपनी ओर खींचा। फोन पापा का ही था। पापा हमसे मिलने आए थे। निश्चित जगह पहुंचने के बाद देखा तो आंखों को यकीन ही नहीं हुआ। मैं तो गिर ही गई होती यदि ‘वो’ मुझे सहारा न देते। पापा और मम्मी दोंनो ही हमसे या यूं कहें कि सूद से मिलने आये थे। उनको आता देख मैं ही नहीं ‘वो’ भी यकीन नहीं कर पा रहे थे। कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे। हम दोनों की आंखें खुशी के कारण भीग गईं। हमने उन्हें प्रणाम किया। हमें आर्शीवाद देते हुए भी उनकी आंखें अपने नाती पर लगी हुई थी। जैसे किसी खिलौने को लेने के लिए बच्चे के हाथ मचलते हैं वैसे ही उन्होंने नाती को गोद में लेकर प्यार करना शुरू किया। आखिरकार मेरी ये इच्छा पूरी हो ही गई। खुशी से हम सभी की आंखे, हंस भी रही थी और रो भी।

“ये सच है ज़ब्त में जी को डुबोया भी नहीं जाता,
मगर अब तो ये आलम है कि रोया भी नहीं जाता।
खुशी आए तो गम को भूल जाना ही मुनासिब है,
मगर गम को मुसर्रत में समाया भी नहीं जाता।”


प्रीती बङथ्वाल

Tuesday, July 15, 2008

15-जुलाई, जन्मदिन मुबारक़ हो।


बाहें फैलाये नई उम्र का,
सावन है खङा।
अब जागो नींद से,
उम्र का एक साल और बढा़।

कब तक तकिये पर सर रखकर,
तुम बचपन में सोती रहोगी।
कब तक आंगन की माटी से,
नंगे पैरो को धोती रहोगी।
अब यौवन के फूल खिले हैं,
फूलों के रंग से खेलो भी।
अब इठलाती मदमस्त हवा है,
उनके आंचल में झूलो भी।

बारिश की इन बौछारों से,
ऊपर बैठा ‘वो’ बोल रहा।
“तारिका” तुम भी खुश रहना
सीख ही लो,
इन बारिश की बूंदों की तरहा।

प्रीती बङथ्वाल “तारिका”

उन सभी पाठकों को जो मेरी तरह आज जन्मदिन के अवसर पर बधाई के पात्र है। मेरी तरफ से सभी को शुभकामनायें।

Monday, July 14, 2008

ये वो जिन्दगी......

विराने में कंही खो गई थी,

शायद ये वो जिन्दगी थी,
जो उदास बैठी, कंही रो रही थी।
रेत के समन्दर में, जिसका घरौंदा था,
समय की आन्धियों ने जिसको,
बार-बार, पैरों तले रौंदा था,
आज फिर वो, आशियाने की तलाश में थी,
आज फिर वो, मस्ती में थी, बहार में थी,
आज फिर उसकी आखों में, नमी थी खुशी की,
आज फिर वो, किसी के इंतज़ार में थी,
नन्हें सपनों को जिसने, आखों में संजोया था,
अपनी खुशियों को जिसने, बार-बार खोया था,
आखों में सपने लिए, आज फिर वो राह में खङी थी,
उसकी आखों में आंसू नहीं,.....
टूटे सपनों की बिखरती लङी थी,
दर्द की स्याही से, जिसने कहानी लिखी थी,
बीते लम्हों की दास्तां, बेजुबानी कही थी,
आज फिर उसकी कहानी में, नया मोङ आया था,
कांटों में जैसे, गुलाब का फूल खिल आया था,
रात भी तारों की लङी लेकर आई थी,
शायद आज फिर, उसकी किस्मत मुस्कुराई थी,
इन्तजार की घङीयां खत्म हुई, परछाई साफ हो गई,
शायद “तारिका” जिन्दगी तेरी,.......
एक प्यारा-सा ख़ाब हो गई।

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प्रीती बङथ्वाल “तारिका”