Wednesday, February 25, 2009

वो सच में..सब समझ रहा था।



वो खामोश नज़रों से मुझे,
अपलक निहारता,
और फिर, कुछ देर बाद,
नज़रे झुका कर चला जाता,
अपने को बहला कर,
फिर लौटता और मुझे,
फिर उसी हाल में देख कर,
सहम जाता।
ये सब देख रही थी मैं,
अपनी भीगी आंखों से,
मगर, चुप थी ये जानकर,कि
वो कहां समझ पा रहा होगा,
जो अभी सब हो रहा था,
हमारे आस-पास।
दिन के सांझ होने तक,
माहौल, कुछ काम में उलझा,
तभी, वो पास आकरके,
मुझसे बोला,
मम्मा बस, अब नही रोना हां....,
क्या ये वो ही है जिसे मेंने,
अभी नादा ही समझा था,
वो छोटा-सा, मेरा प्यारा,
ये सबकुछ समझता था।
वो सच में सब समझ रहा था।
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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- साभार गूगल)



Tuesday, February 24, 2009

जब गया ‘वो’, मैं पुकारती रही…






ज़िन्दगी बनी ख़्वाब कभी,
ख़्वाब कभी ज़िन्दगी बनी,
जब कभी भी तलाश की,
मैं खुद को ढूढ़ती रही।

एक साया दिख के क्यों?
बार-बार ओझल हुआ,
मैं सोच में उलझी हुई, कि
‘वो’ कोई अपना-तो नहीं।

जीवन नहीं लंबा सफर,
ये जान कर भी, मोह में,
उङ गये पंछी को...बस,
मैं पुकारती रही...बस पुकारती रही।


............




(काफी दिन हो चले हैं कि लिखना एक दम छूट सा गया है। जब कोई अपना, बहुत अपना हमसे दूर बहुत दूर चला जाता है तो हर भाव चरम पर होते हैं। फिर से अब जिंदगी को राह पर तो चलना ही होगा और हमें उसके साथ। इसी कोशिश में तारिका।)

प्रीती बङथ्वाल ‘तारिका’
(चित्र-साभार गूगल)

Thursday, January 15, 2009

मेरी तन्हाइयों में...वो कौन था?



यादों के झरोखों से ज़रा,
झांकता, वो कौन था?
मेरी तन्हाइयों में भी वो,
एक पहचान था,वो कौन था?

मैं खुद बेखबर थी,
कि अन्जान थी उससे,
जो मेरे सवालों में, ये भी एक,
सवाल था, वो कौन था?

जिसने मेरे घरौंदे में अपनी,
आस को बसाया था,
कुछ नन्ही खुशियों को घर में,
सितारों सा सजाया था,

इतने करीब थी जिसके,
फिर भी ये दूरियां थी,
कहीं न कहीं कुछ तो,
ये भी मजबूरिया थी,

क्या मैं भी उन खुशियों को अपना,
आशियां बना पांऊगी,
कहीं छूते ही उन ख्वाबों को,
बिखर तो नहीं जाऊंगी,

सोचते ही सोचते, वो अहसास,
एक विश्वास बना, वो कौन था?
मेरी तन्हाइयों में भी वो,
एक पहचान था, वो कौन था?

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प्रीती बङथ्वाल "तारिका"
(चित्र- सभार गूगल)